Hindu Purohit Sangh
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मंदिर या किसी पूजा में पुरोहित किसी से जाति न पूछें टेम्पल प्रीस्ट्स are requested not ask for caste of any individual

मंदिर या किसी पूजा में पुरोहित किसी से जाति न पूछें . शर्मा, वर्मा, वैश्य, दाश की जगह केवल नाम का उच्चारण पर्याप्त होगा . संकल्प हेतु कोई जानकारी न हो तो उसकी जगह 'सुभ' शब्द का प्रयोग होगा. 'संकल्प ' लेते समय केवल गोत्र की आवस्यकता होती है. शास्त्रों के अनुसार गोत्र पूछा जा सकता है, कि न जाति |इस बात का ध्यान दें की यदि किसी को अपना गोत्र नहीं मालूम है तो उसका गोत्र 'कश्यप गोत्र' माना जाये ,या यहाँ पर भी 'शुभ' शब्द का उच्चारण हो . याद रहे की पुस्तकों में दिया गया 'संकल्प' भगवन राम द्वारा की गयी पूजा से लिया गया है.अतः पूजा का स्थान आप जिस भूभाग में हैं उसके अनुसार बदल जायेगा. ब्रिटेन में यदि आप हैं तो जम्बू द्वीपे , भारत खंड न होकर आंग्ला द्वीपे आयरलैंड खंड आदि कहा जायेगा.The Purohit are requested not ask for caste of any individual . Name will suffice ; for Sharma, Varma, Vaishya ands Dasha which are are not mandatory fields. If you do not have information for any of the details of yajman, for shankalp (Sankalpa is a Sanskrit word meaning a resolution done before any prayer ) please use SUBH ( auspicious) word in that place.As per shastras knowledge of Gotra is required , however if the person or purohit is not knowing her or his gotra , you may treat it as Kashyap gotra, as per the law books. Further, the format of sankalp given in the books pertain to the sankalpa taken by Bhagwan Ram during his puja. Therefore, if you are in Britain it will become British dwipe,...as it is geo-location of the person.

Temple & Endowments Social Responsibility Act

Like Corporate Social Responsibility (CSR)provision in Indian Companies Act, there should be a Temple & Endowments Social Responsibility Act to encourage temples and other religious places to spend on social welfare schemes like TTD doing.

शंकरचार्यों का काम न्यायालय को करना पड़ा -Women Can Now Enter All Parts Of All Temples In Maharashtra

महाराष्ट्र में मंदिरों में प्रवेश महिलाओं का मौलिक अधिकार : बॉम्बे हाईकोर्ट,फैसला- महाराष्ट्र में महिलाओं को अब मंदिरों में प्रवेश से रोका नहीं जाएगा, क्‍योंकि बॉम्‍बे उच्च न्यायालय ने आज कहा कि पूजास्थलों पर जाना उनका मौलिक अधिकार है और इसकी रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ने वाले और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ महिलाओं के अभियान की जीत के रूप में देखे जाने वाले इन निर्देशों में अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठाने को कहा कि किसी प्राधिकार द्वारा इस अधिकार पर अतिक्रमण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। एक याचिका में महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर जैसे मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को चुनौती दी गई थी। याचिका में महाराष्ट्र हिन्दू पूजा स्थल (प्रवेश अधिकार) अधिनियम 1956 के प्रावधानों को लागू करने की मांग की गई। महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि वह कानून को लागू करके आदेश के अनुरूप सभी कदम उठाएगी। इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को ... पुरोहित संघ इस निर्णय का स्वागत करता है।

Prohits to Please Note कृपया सभी पुरोहित ध्यान दें

Some versions of the Gurud Purana (pretkhand )recited during last rites contain references to promote Sati system and references derogatory to shudras. These references have no Vedic sanctions. There is not a single reference in Vedas on Sati and superiority and inferiority by birth of Varnas.They are added during 18th century by sone selfish and Vidharmis. Please do not read , recite them during rituals. Please delete them from your books. Hindu Purohit Sangh is coming with an authentic version soon in all Indian languages. गरुड़ पुराण के कुछ संस्करणों में सती तथा जाति सूचक सन्दर्भ आये हैं गरुण पुराण में आज अनेक संस्करण उपलब्ध हैं जिसमें श्लोकों की संख्या व अध्याय संख्या भी विविध हैं।वैदिक साहित्य में सती होने के विषय में न तो कोई मंत्र मिलता है और न कोई निर्देश है। इसी तरह समाज में ऊंच-नीच की व्यवस्था भी वैदिक समय में नहीं रही बाद के काल में भी यह धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक विषय रहा है। यह बात अनेकों पुराणों में आई है कि इतिहास व पुराणों को वेदों के बताए रास्ते से भटना नहीं चाहिए। अतः जहां भी यह भटकाव आया है व स्वार्थी व लाभी तत्त्वों की हरकत समझं।अपनी गरुड़ पुराण की पुस्तक से इन आपत्तिसूचक सन्दर्भों को हटा दें तथा इनका वाचन कदापि न करें. इस बात को सभी पुरोहितों तक पहुचाएं.

कन्या भ्रूण हत्या रोकने में पुरोहित Abortion of girl child is sinful

कन्या भ्रूण हत्या रोकने में पुरोहित- पंडित बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह महापाप है , अपने यजमानों को यह समझकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ। Abortion of girl child is sinful. Sanatan dharma treats it as unforgivable act. Purohit and pundits can help in eliminating this evil.

पुरोहित को स्वेत वस्त्र White cloths for hindu Priests

पुरोहित को स्वेत वस्त्र ( धोती), तिलक, जनेऊ , कलावा, उत्तरीय / गमछा / अंगवस्त्र तथा स्वेत टोपी पहिनने का विधान है. Purohit are prescribed to wear white dhoti, put tilak, Janeu ( sacred thread), Mauli Kalaawa in wrist , uttariya / Gamchha / angvastra and white cap while performing puja.

तीर्थ पर्यटन

1. आज सरकार पर्यटन मंत्रालय पर भारी वजट पास करती है, वहीं पर तीर्थयात्री के विषय पर चिन्ता नहीं करती । इसके लिये एक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन हो तथा इसके लिये अलग स्वतंत्र बजट पारित हो । 2. तीर्थ पवित्र नदियां/सरोवर प्रदूषण मुक्त हो . 3. तीर्थ पुरोहितों के संगठन को सशक्त करने की आवश्यकता बहुत अधिक है । तीर्थों पर मजबूत सशक्त समितियों का गठन हो । 4. हिन्दू हेल्प लाइन के माध्यम से सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है । अतः हिन्दू हेल्प लाइन का महत्व बहुत अधिक है । पोथी परम्परा को जीवंत किया जाये , पोथी हमारे इतिहास का द्योतक है । अधिवेशन के समापन का उद्घोष करने हुये पूज्य आचार्य शेखर जी ने सभी को आवाहन करते हुये एकजुट होने का संकल्प कराया और कहा कि हम संगठित होंगे तो सम्पूर्ण देश एकजुट होगा . पुरोहित महासंघ ,धर्मयात्रा महासंघ ,तीर्थ पुरोहित महासंघ जैसे संगठनो की स्थापना किया जाये .

पुरोहिती का निःशुल्क निर्वाह

धर्म के उन्नयन के लिए यह आवश्यक है की पुरोहितों को वेतन मिले तथा वे कर्मकांड एवं संस्कार का निःशुल्क निर्वाह कर सकें। सभी हिन्दुओं को इसके लिए आगे आना पड़ेगा। एक -एक नगर में पुरोहितों को नियुक्त करना पड़ेगा। एक सर्व सुलभ कड़ी स्थापित करनी पड़ेगी।

सद्गुरु जग्गी ने कहा Satguru Jaggi says

हिन्दुओ के लिए मोक्ष प्राप्ति लक्ष्य है ईस्वर तो केवल साधन है.( Mukti id the highest tool God is only a tool ) । तमाम बातें आज जो विज्ञानं कह रहा है वह केवल प्राचीन भारतीय मनीषिओं ने सोची थी .( Indian mind thought about things science says today which which nobady else thought) भारतीय मस्तिस्क सतत खोज में है , वह मताग्रह से ग्रस्त नहीं है (Indian mind is in continuous quest , it does not believe in dogmas) यदि किसी जीव में संवेग हैं तो मनुष्य को उसका मांस नहीं खाना चाहिए ( If a creature has emotions you should not eat it )

अनादिकाल से सूर्य 'ॐ' का जाप कर रहा है (सुरक्षित गोस्वामी)

नासा के वैज्ञानिकों ने अनेक अनुसंधानों के बाद डीप स्पेस में यंत्रों द्वारा सूर्य में हर क्षण होने वाली एक ध्वनि को रिकॉर्ड किया। उस ध्वनि को सुना तो वैज्ञानिक चकित रह गए, क्योंकि यह ध्वनि कुछ और नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की वैदिक ध्वनि 'ॐ' थी। सुनने में बिलकुल वैसी, जैसे हम 'ॐ' बोलते हैं। इस मंत्र का गुणगान वेदों में ही नहीं, हमारे अन्य ग्रंथों में भी किया गया है। आश्चर्य इस बात का था कि जो गहन ध्वनि मनुष्य अपने कानों से नहीं सुन सकता, उसको ऋषियों ने कैसे सुना। सामान्य व्यक्ति बीस मेगा हर्ट्स से बीस हजार मेगा हर्ट्स की ध्वनियों को ही सुन सकता है। इतनी ही हमारे कान की श्रवण शक्ति है। उससे नीचे या उससे ऊपर की ध्वनि को सुनना संभव ही नहीं है। इंद्रियों की एक सीमा है, उससे कम या ज्यादा में वे कोई जानकारी नहीं दे सकतीं। वैज्ञानिकों का आश्चर्य असल में समाधि की उच्च अवस्था का चमत्कार था जिसमें ऋषियों ने वह ध्वनि सुनी, अनुभव की और वेदों के हर मंत्र से पहले उसे लिखा और 'महामंत्र' बताया। ऋषि कहते हैं, यह ॐ की ध्वनि परमात्मा तक पहुंचने का माध्यम है। यह उसका नाम है। महर्षि पतंजलि कहते हैं 'तस्य वाचकः प्रणव' अर्थात परमात्मा का नाम प्रणव है। प्रणव यानि 'ॐ'। प्रश्न उठता है कि सूर्य में ये ही यह ध्वनि क्यों हो रही है? इसका उत्तर गीता में दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- जो योग का ज्ञान मैंने तुझे दिया, यह मैंने आदिकाल में सूर्य को दिया था। देखा जाए तो तभी से सूर्य नित्य-निरंतर केवल 'ॐ' का ही जाप करता हुआ अनादिकाल से चमक रहा है। यह जाप सूर्य ही नहीं, संपूर्ण ब्रह्मांड कर रहा है। ऋषियों ने कहा था यह ध्वनि ध्यान में अनुभव की जा सकती है, लेकिन कानों से सुनी नहीं जा सकती। इसी ध्वनि को शिव की शक्ति या उनके डमरू से निकली हुई प्रथम ध्वनि कहा जाता है, यही अनहद नाद है। ब्रह्मांड में ही नहीं, यह ध्वनि हमारी चेतना की अंतरतम गहराइयों में भी गूंज रही है। जब हम 'ॐ' का जाप करते हैं, तब सबसे पहले मन विचारों से खाली होता है। उसके बाद भी जब ये जाप चलता रहता है, तब साधक के जाप की फ्रीक्वेंसी उस ब्रह्मांड में गूंजती 'ॐ' की ध्वनि की फ्रीक्वेंसी के समान हो जाती है। उस समय साधक ध्यान की गहराइयों में चला जाता है। इस अवस्था को वननेस या समाधि या अद्वैत कहा जाता है। इस अवस्था में मन, चेतना के साथ लीन हो जाता है।(सभार - नवभारत टाइम्स)

महाराष्ट्र में गोहत्या पर लगा बैन, 5 साल की सजा और 10,000 जुर्माना!

मुंबई: महाराष्ट्र में गौ मांस खाने पर बैन लगा दिया गया है, अब अगर कोई भी शख्स गोमांस बेचता या उसे रखते पााय गया, तो उसे पांच साल की जेल और 10,000 रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है। दरअसल, महाराष्ट्र में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक को आज राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी मिल गई। यह विधेयक 19 साल के लंबे अंतराल के बाद लागू हुआ है। इसके बाद से ही गोहत्या अपराध की श्रेणी में आ गया।

मंदिर में नहीं घुसने दिया तो मुस्लिम बना दलित, कहा- ऐसे धर्म का क्‍या फायदा

मेरठ. गांव के मंदिर में पूजा करने से रोके जाने से नाराज दलित ने इस्लाम अपना लिया। जिले के मोगा गांव के रहने वाले श्याम सिंह दलित वाल्मीकि समुदाय के सदस्य हैं। उन्होंने दो सप्ताह पहले ही इस्लाम अपना कर अपना नाम आजाद रख लिया।'पूजा नहीं करने दिया गया तो हिंदू बने रहने का क्या फायदा' पिछले वर्ष नवंबर में श्याम और उसके समुदाय के अन्य सदस्यों को पुजारी ने कहा था कि उन्हें मंदिर में पूजा करने का अधिकार नहीं है। श्याम का कहना है, ''जब मुझे पूजा करने की ही अनुमित नहीं है तो फिर हिंदू बने रहने का क्या मतलब है।''''सभी संगठन चाहते हैं कि हम इस्लाम न कबूल करें, लेकिन कोई भी हमें हिंदुओं के बीच समान अधिकार देने बात नहीं करता। हम हमेशा से ही ठगे जाते रहे हैं।' 'पुरोहित संघ ऐसे पुजारी को धर्म का भक्ष्यक और अज्ञानी मानता है और इसे शर्मनाक घटना मानता है। सभी हिन्दुओं से बिनती है की समाज को इस अंधकार से उबारने हेतु आगे आएं.

अमेरिकी सेना में हिन्दू महिला एवं पुरुष पुरोहित कों मिलेगा ऊँ का बैज

अमेरिकी इतिहास में पहली बार सेना के प्रतिरक्षा विभाग ने हिन्दू सैन्य पुरोहित कार्यक्रम का शुभारम्भ किया है। आर्मी कैप्टन प्रतिमा धर्म, ने गत माह 16 मई से अमेरिकी सेना की प्रथम हिन्दू पुरोहित के रूप में कार्य करना आरम्भ कर दिया है। प्रतिमा धर्म पहल ऐसी भारतीय मूल की हिन्दू महिला है जो अमेरिकी सेना में प्रथम महिला पुरोहित नियुक्त हुई है। इस नियुक्त् िमें चिन्मय मिशन वैस्ट की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पुरोहिती से कार्यक्रम आरम्भ करने के साथ-साथ भावी हिन्दू पुरोहितों के पहनने हेतु एक बैज (प्रतीक चिन्ह) भी तैयार करने काम चल रहा है। इस संबंध में देशभर के धार्मिक गुरुओं के एक बोर्ड से चर्चा की गयी। इसके अलावा व्हाइट हाउस आॅफिस आॅफ फेथस बेस्ड एण्ड नेबरहुड पार्टनरशिप के सदस्यों से भी विस्तृत चर्चा की गयी। सभी से चर्चा के बाद ऊँ को सर्वसम्मति से नये बैज के रूप में चुन लिया गया है। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि ऊँ सत्य और शान्ति का प्रतीक है। हजारों भारतीयों ने अमेरिकी सेना में काम करने में रुचि है। जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ी वैसे-वैसे सेना में हिन्दू पुरोहित की आवश्यकता भी महसूस की जाने लगी। करीब सन् 1700 से ही अमेरिकी सेना को पुरोहितों अर्थात् धार्मिक गुरुओं का सहयोग मिलता रहा है। सन् 1775 में तत्कालीन काॅन्टीनेंटल कांग्रेस पुरोहितों को 20 डाॅलर प्रतिमहा वेतन देने के लिए सहमत हुई थी। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जार्ज वाशिंगटन ने अपने कमांडरों को आदेश दिया था कि वे बेहतर चरित्रा वाले पुरोहितों को खोज करे ताकि पुरोहित अपने शुद्ध आचरण व्यवहार तथा शिक्षा से सैनिकों का मनोबज बढ़ाकर रख सकें। प्रथम पुरोहित ने प्रोटेस्टेंड मिलिटरी में कार्य किया था लेकिन आजकल पुरोहितों को अनेक भूमिकाओं में काम करना पड़ता है। प्रतिमा धर्म का जन्म और पालन पोषण भारत में हुआ और वह संस्कृत ठीक से पढ़-लिख लेती है। वे कहती है कि हिन्दुत्व स्वभाव से ही तहनशीलता स्वीकार्यता और सभी मतों तथा पंथों के प्रति सम्मान की भावना रखता है। एक सफल सैन्य पुरोहित में ये तीनों ही गुण होने अनिवार्य है।

'घर वापसी '

अन्य धर्मों से हिन्दू धर्मं में 'घर वापसी ' तभी संभव है जब एक ओर तो पहले घर में उनके लिए सम्मानपूर्ण वातावरण तैयार हो दूसरा उन्हें दुसरे धर्म में दियी जा रही सुविधायों से अधिक सुबिधायें हिन्दू धर्म में मिले . घर वापसी केवल प्रेम पर आधारितही हो सकती है .

पश्चिमी गोलार्ध के "नाथद्वारा" Nathdwara" of the western hemisphere

पश्चिमी गोलार्ध के "नाथद्वारा" को वृज के रूप में जाना जाता है। यह सुल्किल हेवन, पेंसिल्वेनिया में स्थित है। लोग साल में एक बार यहाँ की यात्रा करते हैं। मंदिर के भीतर पुजारियों और सेवकों और किसी को भी नकद वेतन का भुगतान नहीं किया जाता है , केवल अपने कर्तव्यों के लिए एक इनाम के रूप में प्रसाद दिया जाता है । "Nathdwara" of the western hemisphere is known as Vraj. It is located in Schuylkill Haven, Pennsylvania. Over 100,000 Hindus visit Vraj in a year. The priests and servants within the temple are not paid any cash salaries, receiving simply prasad as a reward for their duties. Often this prasad is given or sold to guests who visit the temple for darshan.

तीर्थ पुरोहितों की एकजुटता एवं तीर्थ सुधार में प्रयासरत ‘तीर्थ पुरोहित महासंघ’

‘तीर्थ पुरोहित महासंघ’ तीर्थ पुरोहितों की एक अखिल भारतीय संस्था है जिसकी शाखाएं प्रायः देश के सभी तीर्थो में हैं । तीर्थ पुरोहित महासंघ प्रत्येक प्रान्त के तीर्थो की सूची व जानकारी हेतु कार्य कर रहा है । इस कार्य हेतु सभी प्रमुख तीर्थो में संयोजक एवं समितियों का गठन किया गया है । अपनी जगन्नाथपुरी में हुई वार्शिक बैठक में महासंघ ने तीर्थो की वर्तमान दुर्दशा पर चिन्ता व्यक्त की और इसके लिए राज्यों व केन्द्र सरकार की उदासीनता को उत्तरदायी ठहराया गया । तीर्थ पुरोहित समाज की इस कार्य से विरक्ति पर भी चर्चा की । त्रयंबकेष्वर नासिक में 24 जुलाई से होने वाले कुम्भ के दौरान तीर्थ पुरोहित महासम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है । जिसमें सभी राष्ट्रीय पदाधिकारी एवं राज्यों के अध्यक्ष, महामंत्री सहित प्रमुख पदाधिकारीगण भाग लेंगे ।

पुरोहित संघ में रजिस्टर करें . Please help purohits to register in following site.

http://hindupurohitsangh.in/Registration.aspx

चर्च ऑफ इंग्लैंड ने साफ किया पहली महिला बिशप का रास्ता - (Church of England formally approves plans for women bishops)

इंग्लैंनड के चर्च ऑफ इंग्लैंड की शासकीय परिषद ने 17.11.2014 को औपचारिक रूप से ऐतिहासिक कानून पारित किया है, जिसके अनुसार वर्ष 2015 में पहली महिला बिशप बन सकेंगी। इससे सदियों पुरानी पुरुष प्रधान परंपरा टूट जाएगी। इंग्लैंयड में वर्ष 1994 में पहली बार किसी महिला को पादरी बनाया गया था। मगर, तब वे चर्च में बेहद वरिष्ठप भूमिकाएं नहीं निभा सकती थीं। खासतौर से एं‍जलिकन्स् के साथ जारी मतभेद को लेकर। बहरहाल, जैसे ही जनरल सायनोड (चर्च ऑफ इंग्लैंनड में कानून बनाने वाली इकाई) में महिला को आधिकारिक रूप से बिशप बनाए जाने का एलान किया गया, वहां मौजूद लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। यूरोपीय देशों समेत भारत में भी यह सदा विवाद का विषय रहा है कि महिलाओं को प्रीस्ट ( पादरी ) बनाया जाए कि नहीं। आरंभ से ही ईसाई धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय , रोमन कैथलिक और प्रोटेस्टेंट में इस बात पर काफी चर्चाएं हुईं। रोमन कैथलिक चर्च पोप द्वारा संचालित है और उसमें महिलाएं सिर्फ नन्स ( सिस्टर ) बन सकती हैं। उन्हें पादरी बनने की अनुमति नहीं है। दूसरी तरफ भारत में ईसाइयों के अन्य संप्रदायों ने इस ओर कदम उठाया है। चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया ( सीएनआई )ने महिलाओं को पॉस्टर ( पादरी ) का दर्जा दिया है। महिलाओं को धर्म प्रचार से लेकर पूजा विधि का नेतृत्व करने का अधिकार दिया है। मगर अभी तक यह चर्चा नहीं हुई है कि महिलाओं को बिशप बनाया जाए कि नहीं। रोमन कैथलिक , प्रोटेस्टेंट या अन्य संप्रदाय के बीच एक अहम फर्क है। रोमन कैथलिक में जो भी पादरी बनता है ,उसी में से बिशप चुना था। पादरी और नन्स को शादी करने की इजाजत नहीं है। उनको आजीवन अविवाहित रहकर चर्च और समाज की सेवा करनी होती है। मगर प्रोटेस्टेंट या उससे निकली अन्य शाखाओं में ऐसा नहीं हैं। वहां पर प्रीस्ट या बिशप चाहें तो शादी कर सकते हैं।

पुरोहितों-पुजारियों 800 रुपये प्रतिमाह पेंशन, Rupees 800 per month to priests in Uttarakhand

पुरोहितों-पुजारियों की खराब स्थिति और पलायन रोकने के लिए उत्तराखंड राज्य सरकार ने 50 की उम्र पार कर चुके पुजारियों को 800 रुपये प्रतिमाह पेंशन की घोषणा की है। पिछले वर्षों में पैसे की कमी के कारण कई पुरोहित परिवारों के आत्महत्या करने की भी खबरें सामने आई थीं। इस योजना से पहाड़ों के दूरस्थ गांवों में रह रहे पांच लाख पुजारी परिवारों को फायदा मिलने की उम्मीद है। क्यों खराब है हालत पहाड़ पर पुरोहितों और पुजारियों की हालत काफी खराब है। वे गांवों में पूजा-पाठ करके ही आजीविका चलाते हैं। कई बार पुरोहितों को सालभर काम नहीं मिलता। इस कारण रोजी-रोटी के लिए पहाड़ से बाहर निकलना पड़ता है।इस योजना के जरिए सरकार पहाड़ी क्षेत्रों से लोगों का पलायन रोकना चाहती है। The Uttarakhand government has decided to grant a pension of Rs. 800 per month, to purohits above the age of 50, living in the hills to stop their migration to the plains in search of livelihood. हिंदू पुरोहित संघ इस कदम का स्वागत करता है.

वेदों के अनुसार संध्या उपासना प्रति दिन करनी चाहिए।

इस अनुष्ठान के द्वारा दिव्यज्योति, सूर्य या ब्रह्म की उपासना की जाती है। इसका प्रारंभ करने से पूर्व उषाकाल में निद्रा का विसर्जन कर उठ बैठना चाहिए। सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण ओर वंदन करना चाहिए। अनंतर दैनिक दैहिक कृत्य से निवृत्त होकर संविधि स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करे। पवित्र आसन पर बैठकर तिलक लगावे और शिखाबंधन करे। सायंकाल की संध्या पश्चिम दिशा की ओर और प्रात:काल, मध्यान्हकाल की संध्या पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। एकाग्रचित्त होकर जो उपासना की जाती है, उसे संध्या कहते हैं। और्व मुनि राजा सगर से कहते हैं : ”हे राजन् ! बुध्दिमान पुरुष को चाहिए कि सायंकाल के समय सूर्य के रहते हुए और प्रातःकाल तारागण के चमकते हुए ही भलीप्रकार आचमनादि करके विधिपूर्वक संध्योपासना करे ।” संध्या वंदन को नित्य कर्म माना गया है ।। उसकी आवश्यकता शौच, स्नान, भोजन, शयन जैसी दैनिक गतिविधियों की तरह समझी गई है और कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर की स्वच्छता, सुविधा, पुष्टि के लिए साधन जुटाये जाते हैं उसी प्रकार अन्तःकरण पर आये दिन चढ़ने वाली मलीनता को स्वच्छ करने, आत्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने एवं ब्रह्मतेजस् को बढ़ाने के लिए नित्य ही ईश्वराधना नियत समय पर नियमित रूप से करनी चाहिए । गायत्री उपासना का प्रात- सायं अधिक महत्व है । गायत्री उपासना का एक नाम ‘‘संध्या योग’’ भी है ,गायत्री उपासना को ‘‘ प्राण साधना’’ भी कहते हैं ।। ‘‘प्राणी और अग्नि’’ एक ही तत्व है। प्राण विज्ञान कुंडलिनी साधना को पंचाग्नि विद्या भी कहते हैं। इस संध्या की उपासना के प्रकरण में इसके आठ अंग महत्वपूर्ण बतलाए गए हैं। उनके नाम तथा क्रम इस प्रकार हैं - प्राणायाम, मंत्र आचमन, मार्जन, अघमर्षण, सूर्यार्घ, सूर्योपस्थान, गायत्रीजप और विसर्जन। प्राणायाम एक प्रकार का श्वास का व्यायाम है। इस प्रकार की हुई उपासना को सर्वव्यापी ब्रह्म को अर्पित कर देना चाहिए। इस विधान के अनुसार निरंतर उपासना करते रहने से मानव अपने शरीर में उत्पन्न होनेवाले समस्त रोगों से दूर रहता है, समस्त सुख प्राप्त करता है और अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति करता है।

वैदिक धर्म की जय हो Victory to Vedic religion

To Bring in the Dalit and tribal Community in the mainstream society is the divine duty of Purohit community . We must remove negative references , if any, from in our rituals, mindsets and karmkand . They deserve lot of love . दलित और आदिवासी समुदाय को मुख्यधारा हिन्दू समाज में लाना पुरोहित समुदाय का दैवीय कर्तव्य है. हम अपने अनुष्ठानों और कर्मकांड में से, उनके लिए नकारात्मक संदर्भ ,यदि कोई हो, तो दूर करना होगा. वे बहुत प्यार के लायक है.

महिला पुरोहितों की अपार सफलता Sucess of female priests

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में न जाने अब तक कितने ही क्रांतिकारी, सामाजिक और धार्मिक आंदोलन हुए हैं। आज भी समाज के लिए यह शहर एक उदाहरण बन गया है। पहले महिलाओं को पुजारी के रूप में स्वीकारने का काफी विरोध हुआ था लेकिन अब लोग महिला पुरोहितों को स्विर्कारने लगे हैं । शहर की महिला पुजारी आज हर तरह की पूजा, यज्ञ और शादियां करवाती हैं । वैदिक काल में महिला पुरोहितों तथा ऋषियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन यह तंत्र क्रमशः विलुप्त होता गया। बीसवी सदी में ब्रह्मवादिनी (विद्वान महिलाओ ) ने यह कार्य किया जो परंपरा उपासिनी महाराज ने आगे बढाई। उन्होंने कन्याओं को सकोरी , अहमदनगर जिले में स्थित कन्याकुमारी संसथान में पुरोहिती का प्रशिक्षण दिया । पुणे में यह कार्य शंकरराव थेटे ने जन्प्रबोधिनी संस्था के द्वारा 30 साल पहले महिलाओ हेतु प्रशिक्षिण संस्थान स्थापित करके एक सफल युगान्तरी कदम से हुआ । उन्होंने महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठान सिखाने की परम्परा शुरू की। आज पूरे महाराष्ट्र में 5,000 महिला पुजारी हैं और अकेले पुणे में ही यह संख्या 1,000 से ज्यादा है।Female Hindu priests in India are making strides in a male-dominated profession For centuries, many Hindu rituals have been performed by male priests. But now a few institutions in Pune have begun offering courses to female priests. Chitra Lele works as a female Hindu priest in Pune Chitra Lele works as a female Hindu priest in Pune Hindu chants ring through Pradnya Patil's new home. It's on the 11th floor of a luxury apartment building in Pune. In the sunny living room, statues of Hindu gods are arranged on the floor. A smell of incense fills the air. A traditional house-warming ceremony is underway. But Pradnya Patil has broken with tradition today - the 35-year-old has invited a woman priest to perform the ritual. Patil is convinced that women priests are better than their male counterparts. "I recently attended a house-warming ceremony led by a male priest - it took five whole hours! But women priests perform similar rituals in just one hour. They explain the importance of the rituals and why they are still relevant. They're very sincere and committed. Now, my relatives and even my conservative father have switched to women priests." Many Hindu rituals are elaborate and take hours Many Hindu pujas are elaborate rituals that take hours Chitra Lele sits on the floor in Pradnya Patil's apartment and explains the ritual in the local language Marathi. She looks nothing like a traditional Hindu priest in austere white robes. Instead, she wears a colorful silk sari and trendy rimless glasses. The 41-year-old is married and has a teenage daughter. She was drawn to the priesthood out of an interest in Hinduism and Sanskrit. She performs all kinds of rituals: naming ceremonies, weddings as well as festivals. She says female priests have struck a chord among young urban Indians. "We women priests explain the gist of the ritual in just one hour. We try and involve the people watching. So we're popular among the young generation." Priesthood courses Women like Chitra Lele are challenging traditional notions of priesthood. And they are learning to do that at Pune's Dyanprabodhini center, which was started by a social reformer. The school's imposing stone building is located in the bustling old part of the city. Female priests have become increasingly popular with some young, urban Hindus Mostly young, urban Hindus are calling the female priests for ceremonies More than 20 women are currently enrolled in the one-year priesthood course. They come from all Hindu castes. Most are housewives between 40 and 65 years of age. They are trained in religious rituals and each of the 16 sacraments of Hinduism. And they’re taught Sanskrit, the country's classical language in which the Hindu religious mantras are chanted - and which few Indians understand. "We have a great pleasure that women who are learning here are performing outside in society very confidently. They are progressive but they still preserve our ancient traditions and culture also", says Aarya Joshi, teacher of the course. The 30-year-old explains that women priests largely perform religious ceremonies at private homes – not at temples. And they don't perform funerals or death rites either. They are more widely accepted in big cities than in more conservative rural India. Joshi is a Sanskrit researcher herself. She's working on her doctorate on Hindu ancestral worship. She points out that Hinduism has never barred women from performing religious rites. There's even mention of them in ancient religious writings. But later men came to dominate the profession. They declared that priests could only be male and only from a particular Hindu caste. That thinking prevails till today. "The problem occurs because I think that people don't have an exact idea of women priesthood", says Joshi. "They don't know that this is an ancient tradition for the past 5,000 years. It's a typical orthodox mindset. Some 25 percent of the people aren't ready to accept women priesthood. But we think it will change with the period of time, so we have to wait for that." In Pune, female priests have become quite popular In Pune, female priests have become quite popular Mixed reactions On the hot, busy street outside the school, people are divided about whether women should work as priests. "I don't think women should be conducting religious ceremonies. Our culture doesn't allow it. That's how it's always been," says one man. But another one is more open: "I don't have a problem with women priests. But I think it's bad if they conduct religious ceremonies during menstruation. It's impure." A woman adds, "I think it's good if women work as priests. As a woman, you feel less scared talking to them than you do to male priests." Male resistance Back at the school, Joshi says the main opposition to women priests usually comes from the male clergy. "Actually male priests, who are performing rituals in the traditional ways, have a great worry about their source of income because this is their bread and butter." Anand Pandharpure agrees. He's been working as a priest for the last 20 years, having been trained at an early age by his own father. He says that to become a Hindu priest, men have to undergo rigorous daily training at special religious schools for at least 7 to 8 years. The 40-year-old is dismissive of what he calls "priesthood light" courses for women. "You face many complex questions as a Hindu priest", says Pandharpure. "But women often can't answer them because they only get superficial training. And I think people are being fooled when so-called women priests shorten religious rituals. It's more like entertainment. It gives priesthood a bad name." Pandharpure is dressed in the traditional clothes of a Hindu priest – a white dhoti and a black peaked cap. He rejects the idea that women priests pose a threat to him and his male colleagues. "Women often turn to priesthood after 40, once their kids have grown up, and they have nothing to do. But I don't think that’s right. Priesthood is not just a hobby. It's an important responsibility. For us men, being priests is a lifelong learning experience. But frankly we don't take the issue of women priests too seriously – their numbers are really negligible." Tradition and modernity tend to coexist peacefully in India: a businessman performs rituals on his laptop A laptop puja: tradition and modernity tend to blend well in India Hindu rituals in English They may not be taken seriously by some, but female priests are increasingly charting their own course in the male-dominated field. Manisha Shete has been working as a priest for three years. The cheerful 40-year-old has found a new target group for her services. "Nowadays I conduct a lot of marriages in English because Indians who go abroad increasingly marry foreign partners. But they're keen on having an Indian wedding. And Indian parents who live overseas often want their children to learn about their culture. But the children don't understand Marathi. So I conduct the thread ceremony – a rite of passage for boys - in English." The simplified rituals in English can sometimes lead to unexpected reactions. "A father of one of the boys once came to me and said 'you know, my thread ceremony was done decades ago – but it's only now that I understand why it was done and what it meant'", laughs
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