Hindu Purohit Sangh
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चौराहे पर हिन्दू समाज: हिन्दु पुनर्जागरण का एक घोषणा पत्र (फोंट संबंधित त्रुटियों को अनदेखा करें)


विवरण

धार्मिक अस्मिता:- राजनीतिक द़ष्टि से हिन्दू समाज आज अपनी अस्मिता के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक है। फिर भी हमें लगता है कि जहां तक हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों की समझ का सम्बन्ध है, बहुमत आज भी भ्रम की स्थिति में है। वहीं अनुयायियों पर धर्म की पकड़ भी षिथिल हो रही है। हिन्दू समाज में प्रथाओं, रीतियों ,कर्मकाण्डों और संस्कार कर्मो के बारे में अस्पष्टता की स्थिति है। अतः धार्मिक बंधन की अनुपस्थिति में राजनीतिक चेतना, यद्यपि अनिवार्य तो है लेकिन यह दीर्घकाल में, खोखली सिद्ध् होगी । हिंदुओं का एक वर्ग गुमराह हो रहा है। धर्म में दृढ़ आस्था की कमी तथा धार्मिक विधियों तथा साधनों में एक रूपता नहीं है। यदि यही प्रवृति लम्बे समय तक चलती रही तो इसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। वर्ण प्रणाली जो सदियों से समुदाय को एकजुट किए हुए थी वह टूट रही है क्योंकि आज न तो वह समय रहा और न ही तबका समाज मौजूद है, यह समय के चलते भी विकृत हो गयी थी और वह अपनी प्रासंगिकता भी खो चुकी है। प्रारंभिक काल में हिन्दुओं में वर्ण प्रणाली उस प्रकार की भूमिका अदा करती थी जिस प्रकार इसाईयों के बीच चर्च (पोप, कार्डिनियल, बिश्प और पादरी) और इस्लाम में इमाम तथा मौलवी करते हैं। वर्ण व्यवस्था यद्यपि हिन्दुओं को एक संरचना में एकजुट किए थी तथापि यह स्वभावतः विघटनकारी रही है। लेकिन अब यह तंत्र किसी वैकल्पिक संरचना की व्यवस्था की स्थापना से पहले ही मुर्झाया है। जाति व्यवस्था का विघटन हिन्दू समाज में सामाजिक एकता के लिए अच्छी घटना है। इसलिए सभी को इसका स्वागत करना चाहिए। संगठित पुरोहित तंत्र की अपरिहार्यता:- वस्तुतः ईसाई धर्म के समान हिन्दू धर्म में पुरोहित व्यवस्था एक संगठित संरचना की तरह नहीं आ पाई। श्ंेकराचार्य की संस्था औपचारिक रूप में महामण्डलेष्वर, महंत और पन्डित-पुरोहित-पुजारी की श्रेणीबद्ध प्रणाली को विकसित नहीं कर सकी। इसी प्रकार ब्राहृमण केन्द्रित पुरोहित व्यवस्था औपचारिक ढंग से श्ं कराचार्य के मार्गनिर्देश्न में चलने वाली व्यवस्था नहीं बन सकी। पुरोहित वर्ग भी प्रतिनिधि चरित्र की कमी, समाज में जाति चेतना, साख की हानि, असंगठित प्रकृति जैसे विभिन्न कारणों से, पिछले कुछ वर्षों में ,विघटित होने लगी है। हिन्दू धार्मिक तथा राजनीतिक नेतृत्व ने भी इस पूर्णतः असंगठित पुरोहित तंत्र को मजबूती प्रदान करने का कोई प्रयास नहीं किया। पुरोहिती पेशे का आकर्षण भी खोता जा रहा है क्योंलकि हिन्दूओं में पुरोहिती के पेशे के लिए संस्थागत आर्थिक सहायता पद्धति की कमी है। आज एक ऐसी स्थिति आयी है जहां ब्राहमणों की नयी पीढ़ी ने पुरोहिती के पेशे को छोड़ना शुरू कर दिया। संस्थागत प्रयासों की कमी के साथ-साथ समाज की उदासीनता के कारण पुरोहिती पेशे में शामिल होने के लिए अन्य जातियों में भी उत्साह की कमी देखी गई है। जिसके परिणामस्वरूप आज हिन्दू पुरोहित कई इलाकों में संस्कार कार्यो तक के लिए उपलब्ध नहीं हैं। वस्तुतः हिन्दू समुदाय को आवश्यक संस्कार कर्मो से रहित होने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। विघटनात्मक शक्तियां एवं समेकन की चुनौती:- वास्तव में यह स्थिति नई नहीं है। लोग सदियों तक बिना धार्मिक नेतृत्व के रहे हैं और ऐसी स्थिति में वे अन्य धर्मों द्वारा चलाए जा रहे धर्मान्तरण के शिकार भी हुए। आज स्वार्थी तत्वों , जादू-टोनों वालों और यहां तक कि साधुओं का भेष रखकर अपराधियों ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। आज हिन्दुओं की पवित्र संस्थानों का भी स्वार्थी लोगो द्वारा व्यावसायीकरण किया जा रहा है। पूजा,झांकियों, रामलीला, गरबा तथा वस्तुतः प्रत्येक त्यौहारों का स्वार्थी लोगों द्वारा व्यावसायीकरण की कोशिश हो रही है। राजनेता रामलीला के बीच में जाकर माईक ले लेते हैं। यह देखते हुए निराषा होती है कि भगवान गणेश के पोस्टर में ,गणपति समारोह के दौरान, कई प्रकार के विज्ञापन छपे होते हैं और ऐसा ही जन्माष्टमी में भी होता है जहां फिल्मी सितारों को अपनी फिल्मों की मार्केटिंग करने के लिए अच्छा अवसर दिखाई पड़ता है। काफी संख्या में स्वघोशित प्रचारकों ने मंदिरों तथा पूजा स्थलों में देवी-देवताओं के साथ-साथ स्वयं की मूर्तियां भी स्थापित कर दी हैं। उनकी मूर्तियां कुछ मन्दिरों में स्थापित शिव की मूर्तियों से भी बड़ी हैं । यह साई मन्दिर तक सीमित नहीं है। हमें अक्षरधाम मन्दिरों को नजर अंदाज क्यों करना चाहिए। आखिर इन लोगों को मंदिरों में अपनी मूर्तियां नहीं लगाने अथवा हमारी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ न करने के लिए कौन कहेगा ? पिछले कुछ वर्शों में यहां तक कि अपराधियों को श्ंरकराचार्य का वेश बनाकर मंदिर चलाते हुए पाया गया था। इसके अलावा एकीकृत दिशानिर्शों के अभाव मे कुछ वर्गों का व्यवस्था से विश्वामस उठ गया है और उन्होंने मानव, मृत या जड़ की पूजा करनी शुरू कर दी है। धर्म के स्वघोशित नेता जनता को गुमराह कर रहे हैं। हमारे कई प्रचारकों और धर्मिक गुरूओं को धर्म के उदात्त दर्शन की बुनियादी समझ भी नहीं है। इसलिए वे लोग जनता को विश्वास दिलाते हैं कि हिन्दू धर्म एनिमिस्टिक है और इसमें गाय गुरूओं, तांत्रिको और महानायको आदि की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में गुरूओं की बहुलता है, विषेशकर, जबकि वे सम्प्रदायों का अपना संस्करण तैयार करना आरंभ कर देते हैं, जो विघटनकारी है। अधिकतर हिन्दुओं में बेलगाम भौतिकवाद, अपनी परम्पराओं के सम्मान की कमी और गरीब सहधर्मियों की अनदेखी की प्रवृत्ति धर्म के लिए बड़ा खतरा है। हमारे शिक्षण संस्थान पाश्चात्य बन गए हैं या नेतृत्व विच्छिन्त हो गया है। हमारी उदारवादी परंपरा को संगठित धर्मों से लगातार चुनौती मिल रही है। आज हिन्दू समाज दिशाहीन और नेतृत्वहीन हो गया है। साथ ही जनता अपनी धर्मिक तृष्णा को पूरा करने के लिए अक्सर गलत लोगों के हाथों मे पहॅंच जाती हैं। हमारे गुरूओं और साधुओं में से कुछ संदिग्ध चरित्र वाले हैं और उनमें से कुछ जेल तक चले गए हैं। त्याग की अभिकल्पना शायद हमारे कुछ साधुओं में मर्सिडीज पाने के पागलपन में खो गयी है। क्या यह इस महान धर्म के अनुयायियों के लिए खतरे की घंटी नहीं है। वहीं उपरोक्त सभी के परिणाम दिखाई दे रहे हैं। समुदाय में इस प्रकार की स्थिति विशाद की ओर जाती दिखाई देती है। प्रसिद्ध समाज शास्त्री एमिल दुर्खिम ने इसे नार्मलैसनैस अर्थात् आदर्श्विहीनता कहा है। हमारे समाज में यह क्या हो रहा है। हमारे कई मंदिर और धार्मिक स्थल अराजक स्थिति में हैं और वहां भगदड़ जैसी कई घटनाएं सामने आयी हैं। हमारे समाज में आत्महत्या की दर यदि कोई संकेत है तो दुनिया में एक तिहाई आत्महत्याएं भारत में हो रही हैं (हाल ही में विश्वं स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार)। लोगों में मानसिक तनाव, विशाद, मानसिक रोग और कई बीमारियों की असल जड़ तो आस्था के सवाल के साथ जुड़ा हुआ है। इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है। क्या समाज को जगतगुरू शंकराचार्य के धार्मिक नेतृत्व से उम्मीद है । शंकराचार्य की संस्था विश्व में अद्वितीय है। जिन शंकराचार्यओं ने पिछले 1200 वषों में पीठों की शोभा बढ़ाई है, वे अपना जीवन शान्ति, दिव्यता, त्याग, समर्पण से जिये हैं। लेकिन ऐसा इन संतो द्वारा हिन्दुओं को एकजुट करने और आस्था के लिए निर्देश देने की भूमिका के बारे में भी हुआ है, ऐसा कहा नहीं जा सकता। सौभाग्यवश, आज कई सकारात्मक बातें सामने आयी हैं जो साधुओं की आकाशगंगा, महान मुनियों और प्रबुद्ध गुरूओं और स्वामियों के प्रयासों के कारण हुई हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म के प्रसार के लिए अपने जीवन को समर्पित किया है। आज हमें आदि कराचार्य और स्वामी विवेकानंद की तरह हजारों ऐसे गुरूओं की आवश्यकता है जो नई संस्थाएं तैयार करेंगे। चूंकि पहले से कहीं ज्यादा हमें आज नयी संस्थाओं की आवश्यकता है। आज हिन्दू धर्म परेशानियों का सामना कर रहा है, उसके लिए नवीन संस्थाएं ही एकमात्र विकल्प हैं। वास्तव में, विश्व हिन्दू परिष्द और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-एक मात्र ऐसी प्रतिनिधित्व संस्थाएं हैं जो कि आज मौजूद हैं लेकिन वे लौकिक मामलों तक ही सीमित हैं। बहुआयामी पहल के कुछ बिन्दु:- वर्तमान में जटिल सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए हमारी समस्याओं का क्या हल है? निम्नलिखित बातें ऐसी बहुआयामी पहल इसमें शामिल हो सकती हैं:- 1. हिन्दू यह अपेक्षा करते हैं कि जगतगुरू श्ं कराचार्य ही आघ्यात्मिक विशयों पर एकीकृत धार्मिक नेतृत्व का पूरा भार उठाएंगे। विश्व भर के हिन्दू श्ंकराचायों से अपेक्षा करते हैं कि वे उनके लिए वही भूमिका अदा करेंगे जैसे कि आदि श्ंेकराचार्य ने की। इस नेतृत्व की दृष्टि उन अनुयायियों, जो वंचित रहे हैं और समाज के तल में बैठे हैं, पर भी केन्द्रित होनी चाहिए। वास्तव में, शायद यह युगों में पहली बार हुआ है कि एक श्ंंकराचार्य सामने आए और उन्होंने हिन्दुओं से, सावधानीपूर्ण शब्द में, अपनी आस्था से न भटकने और साई बाबा की पूजा करने से बचने के बारे में कहा। यह अत्यंत अदभुत था क्योंकि आदि श्ंकराचार्य के बाद यह संस्था काफी निश्क्रिय बनी नही और श्ंकराचार्य जनता से काफी विमुख बने रहे। कई श्ंकराचार्य तो ”मुझे छुओ नई मैं पवित्र हूं“ के बंधन से बाहर नहीं आ पाये। हिन्दू धर्म का उच्च नेतृत्व कर्मकाण्ड में तल्लीन रहा जैसा कि शायद ही आदि श्ंंकराचार्य के मस्तिश्क में रहा होगा जब वे एक निश्चित उद्देश्य के साथ अपने आंदोलन को संस्थागत कर रहे थे। 2. आज पुरोहित वर्ग को एक पदानुक्रम के अनुसार संस्थागत ढ़ांचे में स्थापित करने की आवश्यकता है, यह श्रंखला मौजूद ढ़ांचे पर आधारित हो और इस प्रकार हो – शीर्ष पर श्ंकराचार्य मण्डल, उसके बाद महामण्डलेष्वर, फिर आचार्य तथा महंत, और जमीनी स्तर पर पंडित, पुरोहित, साधु व पुजारी वर्ग। प्रत्येक अपने से उच्च को रिपोर्ट करेगा। वस्तुतः पदानुक्रम रूप से संगठित वृत्तिक वर्ग न केवल वर्ण प्रणाली को प्रतिस्थापित करेगा अपितु यह हिन्दू समाज को मजबूत करने का एकमात्र समाधान भी है। समस्त पर्यवेक्षण व निर्देश उच्चतम स्तर के पास हों। सभी पुरोहित मंहतो से जुड़े रहेंगे और उनका भौगोलिक क्षेत्र निर्धारित किया जाएगा। उन्हें यथासंभव मंदिरों में तैनात किया जाए और उनकी बुनियादी आवश्यकताओं की देखभाल करने के लिए कुछ राशि का भुगतान भी उन्हें किया जाए। इसके लिए निधि का सृजन हो जिसमें हिन्दू समुदाय अंशदान करेगा। स्वयं पुरोहित भी अपनी योग्यता के आधार पर पदानुक्रम में वर्गीकृत होने चाहिए। पुरोहित-पुजारी हिन्दू कुटुम्ब की रीढ़ हैं:- विश्व स्तरीय आवश्यकताओं को देखते हुए पुरोहित और पुजारियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और उनकी भर्ती की जानी चाहिए। पुरोहित, पुजारी और आचार्यों के लिए प्रशिक्षण संस्थान समुदाय के समर्थन से स्थापित किए जाने चाहिए। हमें सेटेलाईट केन्द्रों के साथ समस्त राज्यों की राजधानियों में हिन्दू पुजारियों के लिए उन्नत प्रशिक्षण केन्द्र खोलने होंगे। इस पेशे के लिए तीव्र बौधिक क्षमता वाले युवाओं को आकृष्ट करने की आवश्यकता है। अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और महिलाओं जैसे गैर-पारंपरिक एवं वंचित वर्गों से भर्ती अभियान आरंभ किया जाना चाहिए, उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और विश्व में हर जगह रिक्त स्थानों पर पुरोहितों को भेजना चाहिए। पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए पिछली सदी से एक भी उत्कृष्ट औपचारिक प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित हुआ नहीं हो पाया है जबकि गुरू- शिष्य परंपरा की पहुँच घटती जा रही है। इसलिए नव स्थापित हिन्दू-पुरोहित संघ , जो एक सुधार आंदोलन भी है, को सच्चे मन से दृढ़संकल्पना के साथ कदम बढ़ाना होगा। हमें इस बात का एहसास है कि पुरोहित-पुजारी हिन्दू कुटुम्ब की रीढ़ हैं। 3. संस्थागत प्रयास सभी हिन्दुओं की एकता हेतु आवश्यकता हैं। हिन्दू धर्म अब एक विश्वव्यापी धर्म है इसलिए हमें सभी कदम इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही उठाने होंगे। दुनिया में अधिक से अधिक लोंगो के बीच इस उदात्त धर्म दर्शन के प्रसार से वसुदेव कुटुम्बकम, अर्थात् पूरे विश्व में राम राज्य स्थापित करने की आवश्यकता है। साथ ही हमें दूरदराज के क्षेत्रों, वंचित समुदायों और आदिवासी-वनवासी समुदायों पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। हमारे प्रयास मध्यम और उच्च वर्ग तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए। धर्म-प्रसार केन्द्र:- 4. भारत के सभी जिला मुख्यालयों और विश्व् के प्रमुख शहरों में धर्म प्रसार केन्द्र स्थापित होने चाहिए। ये केन्द्र हिन्दू धर्म के ज्ञान के इच्छुक और हिन्दू धर्म में शामिल होने के इच्छुक लोगों की सहायता करेगा। इन सुविधा केन्द्रों में सभी हिन्दू सम्प्रदायों का विकल्प होना चाहिए जिसमें आर्य समाज, सनातन धर्म आदि शामिल हैं। पुरोहितों और मंदिर के पुजारियों को इसके लिए सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। वहीं हमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़े वर्गों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं पर भी ध्यान केन्द्रित करना है जिसमें हमारा उद्देष्य अन्ततः जाति प्रथा का उन्मूलन है। सदियों से शैवो ने इन वर्गों को पुजारियों के रूप में नियुक्त किया है और हमें इसका प्रसार करना चाहिए । जाति उन्मूलन व समेकन:- 5. हिन्दू धर्म को पनपने के लिए जाति का उन्मूलन अपरिहार्य है। सनातन धर्म, जिसे हिन्दूधर्म के रूप में जाना जाता है, के अन्तर्गत आने वाली विभिन्न जातियों का एकीकरण समय की मांग है। जो कोई भी ऐसा नहीं सोचता वह शायद धर्म के सम्मुख खडे़ संकट से तथा इतिहास में हुई गलतियों और उनके परिणामों से अनभिज्ञ है। कुछ स्वार्थी तत्वों ने शास्त्रों में कुछ श्लोक ऐसे जोडे़ जिससे हिन्दू बंट गए और परिणामस्वरूप विधर्मियों की गुलामी झेलनी पड़ी। ऐसे आचार्यो व धर्माचार्यो का, जो हिन्दूओं में जाति प्रथा को प्रश्रय देते हैं, हिन्दू पुरोहित संघ घोर विरोध करेगा । दरअसल, पुरोहित वर्ग के आर्थिक हित भी इससे चोटिल होते हैं। स्वधर्मी एक कुटुम्ब हैं। आदि शंकराचार्य के नागा साधुओं का एक दल बनाया था जो धर्म में आ रही पथभ्रश्टता को रोकते थे लेकिन आज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उनकी यह भूमिका अप्रासंगिक हो गई है। अतः समाज की अंतरात्मा के रखवाले शंकराचार्य को हिन्दू एकता का प्रतीक बनना होगा। वस्तुतः इन पीठों को अधिक समावेशी बनाने के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है क्योंकि इसका निर्णय लेने का अधिकार स्वयं शंकराचार्य के पास है। हिन्दू समाज ऐसी ऐतिहासिक घड़ी की प्रतीक्षा करेगा जब कोई शंकराचार्य किसी वंचित या आदिवासी को अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे। ऐसा समय निष्चित ही आएगा लेकिन यह जितनी जल्दी आए उतना ही अच्छा है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास आदि शंकराचार्य के समान गुणों वाले शंकराचार्य नहीं रहे। कांची मठ ने हिन्दू एकता के सम्बन्ध में अग्रणी पहल की है इस संदर्भ में अन्तर्जातीय विवाह को बढ़ावा देना पड़ेगा। हिमाचल सरकार ऐसे विवाहों हेतु रूपया 75,000/- का सहयोग देती है। ऐसे प्रयास अन्य सरकारों द्वारा भी लिए जाये। तथापि, इसे जन-आन्दोलन के रूप में आगे बढ़ाना होगा । दिगभ्रमित होना:- त्याग की संकल्पना हिन्दू धर्म की महान् देन है लेकिन आज हमारे कुछ सन्यासियों के बीच पनपती विलासिता चिन्ताजनक है। यद्यपि हमारे संतो, साधुओं और मुनियों ने हमारे धर्म के लिए विभिन्न दिशाओं में अतुल्य और अविश्वसनीय योगदान दिया है परन्तु यह उनका व्यक्तिगत प्रयास था न कि समुदाय से आई संस्थागत सहायता। हिन्दू धर्म में अनुसंधान और विश्लेषण हेतु एक भी औपचारिक संस्थान अभी तक भारत में नहीं है। सामुदायिक सदस्यों द्वारा रामलीला, जन्मास्टदमी, विजयदश्मी, मकर सक्रंति और सामुदायिक कार्यों आदि समारोहों को आयोजित करने के लिए सामुदायिक केन्द्र नहीं हैं। जिसके परिणामस्वरूप, आज इन क्रियाकलापों को आयोजित करने के लिए स्थान उपलब्ध नहीं हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले 25 वर्शों में, विभिन्न प्राधिकारियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और संस्थागत सहायता की कमी के कारण, दिल्ली में होने वाली रामलीलाओं की संख्या में 80 प्रतिश्त कमी आई है। दुर्भाग्यवश, कुछ धनी हिन्दू अपने स्वार्थ के लिए तांत्रिकों और नकली साधुओं पर करोड़ो रूपए खर्च कर देते हैं परन्तु समुदाय सेवाओं पर पैसा व्यय करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। साथ ही कोई ऐसी संस्था भी नहीं है जो इन कार्यो को हाथ में ले। अनाथ स्थिति में हिन्दू धर्म तथा हिन्दू धर्म में संस्थाओं की घोर कमी:- दिलचस्प बात यह है कि हिन्दूओं का कोई ऐसा संगठन नहीं है जो धर्मार्थ दान व चंदा प्राप्त करेगा। मौजूदा एंडोमेंट बोर्ड सरकार द्वारा बनाए गए हैं और चन्दा देने वालों द्वारा एकत्रित निधि का उपयोग हमेशा आशा के अनुरूप उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाता है। वास्तव में आज हिन्दू धर्म एक अनाथ के समान है क्योंकि अधिकतर धर्म हेतु दिया गया परोपकारी समर्थन मंदिरों, गुरूओ अथवा उनके तथा सरकार द्वारा निर्मित संस्थानों को मिलता है और इस दान का उपयोग भी बडे़ उद्देश्यों हेतु न होकर अनावश्यक और अनियोजित तरीके से होता है और बहुधा व्यक्ति या समूह विश् पर होता है। वित्त पोशण के लिए केन्दी्रकृत धार्मिक निकाय की कमी एक गंभीर मुद्दा है। हिन्दू धर्म में संस्थाओं की घोर कमी है। यह बड़ा रोचक तथ्य है कि हिन्दुओं के बच्चे आज भी ईसाईयों के स्कूलों में पढ़ने जा रहे है। इसलिए 65 वर्शो में जहां ईसाई स्कूलों की संख्या में कई गुना वृद्वि हुई है वहीं एक भी गुणवत्ता वाला अखिल भारतीय स्कूल की श्रृंख्ला, जो हिन्दु संस्कारों पर आधारित हो, स्थापित नहीं हो पाई है जिसके परिणाम सामने हैं । एक ऐसा हिन्दु युवाा वर्ग पैदा हुआ है जो अपनी संस्कृति से प्रेम नहीं करता और विमुख है । इसी तरह जिस फिल्म उद्योग का भारी प्रभाव जन-मानस में पड़ता है, वह भी विमुख है । हिन्दू पुरोहित संघ मानता है कि हमारे धार्मिक नेताओं को एकत्रित होने और सुधारात्मक पहल करने की आवश्यकता है। उनमें से कुछ बिन्दु नीचे दिए गए हैं:- 1. विचारों की स्पष्टता और आस्था की मौलिक सिद्वान्तों, ईश्वर की संकल्पना तथा सर्वोच्च देवता के रूप में शिव का जनता में ज्ञान प्रसार करने की आवश्यंकता है। कर्मकाण्डों व संस्कारों को समयानुकूल तथा अधिक प्रासंगिक बनाया जाए। हिन्दू धर्म में जहां उपनिष्दों् में निहित गूढ़ ग्यान को समझने के लिए प्रकाण्ड विध्वता चाहिए वहीं कई ग्रन्थों में इस अलौकिक व जटिल ज्ञान को सामान्य जनों तक पहुंचाने के लिए पशुओं, जड़-चेतन वस्तुओं एवं अनेक दृश्टान्तों का सहारा लिया गया है। इसमें एक चिन्ता भी रहती है कि यदि व्यापक समझ का अभाव है तो भक्त ऐसे दृश्टान्तों से अर्थ का अनर्थ कर सकते हैं। 2. क्या करें और क्या न करें की एक सूची विभिन्न पहलुओं पर तैयार की जानी चाहिए। उनमें से कुछ बातें निम्नलिखित हैं:- क) नदियों मे पूजा की सामग्री आदि न फेकें। ख) फूल, पैसा, नारियल, अगरबत्ती अथवा अन्य चढ़ावा गर्भगृह अथवा मूर्तियों में न चढ़ाया जाए। उन्हें निर्दिष्ट स्थानों पर ही चढ़ाया जाए। सभी भक्त मंदिर के प्रांगण की सफाई के लिए कुछ समय समर्पित करें। ग) शवों का प्रदूशण रहित साफ दाहगृह में ही दाह संस्कार किया जाए। घ) किसी को भी देवी-देवताओं के चित्र अपने विज्ञापनों, कैलेण्डर अथवा अन्य कोई वाणिज्यिक सामग्री में मुद्रित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 3. त्यौहारों, यात्राओ, झांकियों, संस्कारों और कर्मकाण्ड आयोजित करने के सम्बन्ध में मार्ग निर्देश जारी किए जाने चाहिए। 4. हमें कई स्वार्थी तांत्रिकों के चंगुल से धर्म को स्वतंत्र कराना होगा। गुरू की संकल्पना की पुनः जांच की आवश्यकता है क्योंकि यह आजकल सबसे अधिक दुरूपयोग में लाया शब्द बन गया है। 5. मानव मूर्तियों को एक व्यवस्थित ढंग से मंदिरों से हटा देना चाहिए। उन्हें मंदिरों के संग्रहालय में रख दिया जाना चाहिए। 6. पूजा, आरती, कर्मकाण्ड और संस्कारों का सार्वभौमिकरण और मानकीकरण किया जाना चाहिए। सभी को हिन्दू धर्म के मूल ज्ञान से परिचित होना चाहिए। महा आरती अवधारणा को बड़े उत्सव के रूप में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि यह हिन्दूओं के बीच कुटुम्ब की भावना लाएगा। इसी प्रकार, बड़ी कतारों से रैलियों, झांकियों, कीर्तनों तथा अनुशासित सभाओं पर जोर दिया जाना चाहिए । साथ ही सुविधाजनक एवं सुरक्षित घाटों, मन्दिर परिसरों, पे्रक्षण गृहों, खुले स्तलों का निर्माण हो जहां प्रत्येक व्यक्ति को समान सुविधा हो। मराठी अथवा अन्य भाषाओं में प्रचलित आरती हिन्दी में अपनाने की आवश्यतकता है क्योंकि ये हमारी पुरानी परम्पराएं वाली भाषायें हैं। पूजा के समय आरती, मंत्र और पूजा की लिखित प्रतिलिपि सभी को उपलब्ध करायी जानी चाहिए जिसे पूजा समाप्ति के पश्चात् वापिस किया जाएगा। 7. हम सामुदायिक पूजा, आध्यात्मिक सभाओं, महा आरती, कीर्तन, भजन, रामलीला-कृष्णलीला, महापूजा और सामूदायिक भवनों में विभिन्न प्रकार के प्रातः कालीन प्रार्थना, कथा सुनने और भजन के लिए विभिन्न आकारों वाले कई सभागारों और बहुमंजिला मण्डली केन्द्रों का निर्माण करें। 8. मंदिरों में देव प्रतिमा के नजदीक जाने के लिए भगदड़ करने के स्थान पर सार्वभौमिक दर्शन को प्रोत्साहित किया जाए। अति विशिष्ट व्यक्ति की धारणा धर्म क्षेत्र से दूर होनी अति आवश्यक है। 9. आस्था के मामलों में केवल शंकराचार्यर्यों की संसद को दिशा-निर्देश देने व शास्त्रों की व्याख्या करने का अधिकार हो। इसके लिए उन्हें जातिवादी सोच, यदि कोई है, तो उससे बाहर आना पड़ेगा। 10. पुरोहितों की क्षमता में वृद्धि करते हुए उनकी भूमिका का विस्तार करना चाहिए ताकि वे स्कूलों में प्रवचन, धर्म के व्याख्याता तथा एडवोकेट के रूप में अन्तर धार्मिक बहस में भाग लेने तथा उपदेश देने योग्य बनें जिसमें योग, प्राणायाम और ध्यान शामिल हो सके। उनके लिए नैतिक मूल्यों और नैतिकता का उपदेश सबसे महत्वपूर्ण है। 11. हनुमान व्यायामशाला और अखाड़ों जैसे पांरपरिक अवधारणाओं को पुनर्जीवित और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। प्रत्येक मंदिर में, जहां संभव हो, खेल और जिम्नाजियम की सुविधाएं होनी चाहिए क्योंकि हमारे धर्म में शारीरिक स्वस्थ्य आघ्यात्मिक उन्नयन के लिए आवश्यक माना गया है (शरीर माध्यम खुल धर्मा साधनम)। आयुर्वेद और नाड़ीज्ञान को बढ़ावा देने के लिए व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता है। ये हिन्दू जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं। 12. धर्म संसद की बैठक वर्ष में दो बार आयोजित की जानी चाहिए। हमारे उन ग्रन्थों से जातिसूचक संदर्भो को जांचने की आवश्यधकता है और गीता में दी गई वर्ण की परिभाषा अर्थात् गुण, कर्म विभगसः के अनुसार सोचने की आवश्यकता है अर्थात् जन्म से कोई ऊंचा नहीं होता (जन्मना जायते षूद्र) हिन्दू पुरोहित संघ का मानना है कि कुछ बाद में लिखे पुराणों में जातिसूचक श्लोक, तत्कालीन कुछ पुरोहित वर्ग ने स्वार्थसिद्वि हेतु बाद में जोडे़ हैं और जिसे हिन्दू पुरोहित संघ दुर्भाग्यपूर्ण मानने हेतु षास्त्रों से ध्यानपूर्वक उन्हें अलग करने के पक्ष में हैं। ऐसी ही मान्यता महिलाओं के प्रति आये कुछ संदभों के बारे में भी पुरोहित संघ रखता है। असल में, ये संदर्भ ग्रन्थों के सार से मेल ही नहीं खाते। एक बड़े वर्ग में पुरोहित समाज के प्रति नकारात्मक नज़रिया है और यह वर्ग पुरोहितों को हिन्दु समाज में आई अनेक कुरीतियों के लिए उत्तरदायी मानता है । पुरोहित समाज कैसे इस छवि से कैसे उभरे, यह एक चुनौती है । 13. एक अम्ब्रैला संस्था के रूप में एक मंदिर और 'तीर्थ सलाहकार बोर्ड ' का गठन किया जाए जिसमें सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न मंदिरों, एंडोमेंट्स, धर्मार्थ संस्थाओं, मंदिर की सम्पत्तियों और तीर्थ स्थानों के अच्छे प्रबन्धन पर सलाहकार संबंधी कार्य किए जाएं। 14. धार्मिक समारोहों के आयोजन के लिए एक 'आयोजन समिति’ का गठन किया जाना चाहिए। जो आपदा परामर्ष, भगदड़ की स्थिति और सम्बंधित प्राधिकारियों के सम्पर्क से मार्ग निर्दश् जारी करने में अहम भूमिका निभाएगी। इसका गठन जितना जल्दी हो सके उतना अच्छा है। 15. धार्मिक कार्यों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए ' हिन्दू निधि बोर्ड 'का गठन किया जाए। जाने-माने हिन्दुओं को श्ं्कराचायों और गुरूओं द्वारा बोर्ड में नियुक्त किया जाए। 16. हमें हिन्दुओं के बीच वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को लोकप्रिय बनाने की जरूरत है। स्वधर्मी के साथ एक कुटुम्ब की तरह व्यवहार करना चाहिए। हमें स्वधर्मी की धार्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना योगदान देना चाहिए। सभी सदस्य स्वधर्मी की बेहतरी और उनकी धार्मिक और आध्यात्कि जरूरतों को पूरा करने का प्रयत्न करना चाहिए। सभी हिन्दू धर्मार्थ कार्यो हेतु अपनी बचत का दशांश / दसवां भाग दान दें। 17. अपने क्षेत्रों में आदेशों को लागू करने का अधिकार महामण्डलेष्वर/महंत के पास हों और आस्था से जुडे़ प्रश्नों को शिक्षा के माध्यम से हल किया जा सकता है। माता-पिता को दैनिक धर्माचरण पर दिशानिर्देश जारी होने चाहिए। 18. हिंदू मानदंडों के आधार पर अखिल भारतीय स्कूल की श्रृंख्ला स्थापित किया जाना चाहिए . हिन्दू धर्म सदा ही एक विकासोन्मुख धर्म रहा है, यहां ऋषि और प्रबुद्ध लोगों की बड़ी संख्या से एक भव्य दर्शन विकसित हुआ है। यह धर्म दर्शन लचीला है इसलिए इसे कभी भी वैज्ञानिक उन्नति से खतरा नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि उपरोक्त सुझावों की ओर कौन पहल करेगा। आओ इस पर बहस करें। लेकिन चीजों को आकार देने के लिए हिन्दू पुरोहित संघ ने उपरोक्त सुझावों पर कार्य करने के लिए निम्नलिखित अस्थायी संरचना का प्रस्ताव किया है:- 1. सभी पांच श्ंकराचार्य, महामण्डलेष्वर और महंत 2. राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख 3. विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष 4. बाबा रामदेव जी 5. श्री श्री रविश्ंकर जी 6. मुनि चिदानंद सरस्वती जी 7. श्री राजीव मल्होत्रा 8. दो व्यावसायिक हस्तियां अधिक जानकारी व सहयोग:- कृपया हमारी वैब साइट www.hindupurohitsangh.com तथा फेसबुक पेजwww.Facebook.com / hindu.purohitsangh में जायें। हमें उपरोक्त कार्यो हेतु सहयोग भी चाहिए। अधिक जानकारी हेतु www.hindupurohitsangh.com में जायें। धन्यवाद ।

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