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गुरू की संकल्पना Concept of Guru


विवरण

गुरू शब्द का आज भारी दुरूपयोग हो रहा है । यह बात रोचक है कि गुरू परम्परा का उद्भव अद्वैत दर्शन की देन है, जहां सदगुरू को परमात्मा का द्वार माना गया है । लेकिन आज के कुछ स्वार्थी स्वामियों व संतों ने अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात् ‘मैं ब्रह्म का अणु हूॅं’ की जगह ‘मैं ही ब्रह्म हूॅं’ मानकर भोले-भाले भक्तों को दिग्भक्ति किया है । वे आस्थावान हिन्दुओं को अपना भक्त बनाते हैं और शास्त्र सम्मत ज्ञान देने के बजाय जनता को वर्गलाकर अपने किस्म के एवं नए पंथ का प्रतिपादन करके उन्हें दिग्भ्रमित करते हैं । वे मन्दिर बनवाते हैं जहां अपनी ही मूर्ति स्थापित कर देते हैं और इस प्रकार सनातन धर्म की महान् उदारवाती परम्परा का दुरूपयोग करते हैं । स्वामियों की लोकप्रियता के कारण:- 1. उन्होंने जाति व लिंग विभेद तोडे़ और सभी के लिए अपने दरवाजे खोले जैसाकि शंकराचार्यो की ऋंख्ला में संकुचित स्तर में था । 2. उन्होंने जनता की भाषा में प्रवचन दिए । 3. उन्होंने लोगों में मृत्यु के भय पर अधिक जोर दिया और मुक्ति दिलाने का भरोसा दिया । 4. कर्मकाण्डों की जटिलताओं की निन्दा की । 5. उन्होंने लोक लुभावन तरीके जैसे गायन, छोटे प्रवचन आदि अपनाए तथा स्वयं को अवतारी पुरूश की तरह पेश किया । नकारात्मक पहलू:- 1. धर्म का वाणिज्यिकरण किया । 2. अकूत सम्पत्ति करके एकत्रित करके उसे अनावश्यक मदों पर खर्च किया। त्याग की जगह विलासिता वाले आश्रम बनाए । 3. उनमें अधिकांष लोगों में धर्म की दार्शनिक पकड़ नहीं थी और अन्य धर्मो तथा पश्चिमी दर्शन व सिद्वान्तों व आधुनिक सामाजिक दर्शन की जानकारी नहीं रही है । उनमें अधिकतर कमोवेश मध्यम स्तर की शिक्षा प्राप्त रहे हैं और कुछ लगभग अनपढ़ जैसे । उन्होंने प्रायः हिन्दू धर्म में केन्दित होने के बजाय विभिन्न धर्मो की जुगलबंदी कर प्रवचन दिए । गुरू की परम्परा:- गुरू आत्मानुभवी हो, जीवनमुक्त हो, ब्रह्मज्ञानी हो, दयालु, त्यागी और निर्लोभी हो शास्त्रों में ऐसे गुरू के लक्षण बताये गये हैं । गुरू निश्चित तौर पर प्रत्येक युग आदि में गुरू की परम्परा पर चल रहा हो अर्थात् आदि शंकराचार्य को अपना सदगुरू मानता हो । गुरू कौन हैं ? शास्त्रों में गुरूओं को दो श्रेणियों में बांटा है:- प्रथम, शिक्षा गुरू अर्थात् जो लौकिक शिक्षा देता है । इस श्रेणी में अनेक लोग आ सकते हैं और दूसरा दीक्षा गुरू जो पारलौकिक ज्ञान देता है । आपके जीवन में केवल एक ही दीक्षा गुरू बन सकता है । भगवान् दक्षिणमूर्ति सतयुग के प्रथम गुरू (आदि जगतगुरू) थे । वे स्वयं भगवान् शिव थे । भगवान् दत्तात्रेय त्रेतायुग के आदि गुरू थे तथा भगवान् वेदव्यास द्वापर युग के आदि गुरू थे । भगवान् आदि शंकराचार्य कलियुग के आदि गुरू हैं । अतः ये सभी गुरू ईश्वर के रूप थे । वेद व्यास को चिरंजीवी माना गया है अर्थात् वे साक्षात गुरू हैं । बाद वाले सभी गुरू उस युग के गुरू का अनुसरण करेंगे तथा उनके दिए ज्ञान का प्रसार करेंगे। इस प्रकार चार पीठों के शंकराचार्य के अतिरिक्त आज गुरू की संज्ञा औरों को नहीं मिल सकती है क्योंकि उन्होंने विषयांतर किया है । बात गुरू नहीं सद्गुरू की है । उपरोक्त सभी सद्गुरू थे । कबीरदास ने भी सद्गुरू की ही बात की है। स्कन्द पुराण में वर्णित गुरू गीता में देवाधिदेव व शिव गुरू की भूमिका में है । मुण्डकोपनिषद में वेदों के रहस्य को समझने वाले को गुरू कहा है । ईष्वर अगोचर हैं गुरू मूर्त है । प्राचीन गुरूओं ने गूढ़ विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे हैं । शास्त्रानुसार यदि आपको सद्गुरू न मिल सके तो आप चारों युगों में उत्पन्न किसी भी आदिगुरू को अपना गुरू मानकर भक्ति कर सकते हैं । गुरू का जीवन उपदेषकारी हो वह प्रत्येक भक्ति पर व्यक्तिगत ध्यान दे सके । गुरू की खोज शास्त्रानुसार उसी को करनी चाहिए जो साक्षी भाव रखते हो, जिनका मन शुद्ध हो, जिन्हें इन्द्रियों पर नियंत्रण हो, जिन्हें सांसारिकता से विरक्ति हो और जो मोक्ष की अशीम अभिलाशा रखते हों । जय गुरू, शिव गुरू, हरि गुरू राम । जगत गुरू, प्रणाम, गुरू सत गुरू श्याम । गुरु कैसा हो.-- स्वामी शिवानंद ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि " आप जिस ब्यक्ति को अपना गुरु चुनें उसका चरित्र बेदाग और अनुकरणीय होना चाहिए। वह बिल्कुल निरू- स्वार्थ हो और वासना और लालच से मुक्त हो। उसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो । उसे आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार हो और आध्यात्मिक पथ में आप का नेतृत्व करने में सक्षम हो । एक असली गुरु ब्रह्म-निष्ठ और ब्रह्म-श्रोत्रि होता है। आपके संदेह दूर कर सकने में सक्षम होता है। उसे सम्यक दृष्टि होती है, वह दया का सागर है, राग-द्वेश, हर्ष, शोक, अहंकार, क्रोध, वासना लालच, मोह, गर्व , आदि से मुक्त है। उसकी उपस्थिति मात्र से शांति और मन की ऊंचाई प्राप्त हो जाती है। उसे किसी से कुछ भी उम्मीद नहीं है। वह एक अनुकरणीय चरित्र वाला तथा खुशी और आनंद से भरा होता है।लेकिन मुझे कारोबारी गुरु नापसंद हैं। मुझे गुरुओं और आचार्यों के भेस में कपटी लोगए जो चेलों की जमात और पैसा इकट्ठा करने में लगे हैंए से नफरत है । इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती। वे समाज के कीड़े हैं। गुरुवाद मात्र व्यवसाय है और इसे अच्छी तरह से भारत की धरती से खत्म किया जाना चाहिए। यह भारत के लोगों के लिए खोफनक तबाही और नुकसान कर रहा है। यह पश्चिमी देशों और विभिन्न देशों के लोगों के मन में भारत के प्रति एक बहुत ही बुरा प्रभाव पैदा कर रहा है। भारत इस गुरुवाद के व्यापार के कारण अपनी आध्यात्मिक महिमा खो रहा है। इस गंभीर रोग को नष्ट करने के लिए तुरंत कठोर कदम लिए जाने चाहिए। इसके उन्मूलन के हर संभव प्रयास होने चाहिए । यह एक घृणित आकार ग्रहण कर चुका है। यह बहुत ही संक्रामक बन गया है। कईयों ने इसे आजीविका का एक आसान साधन के रूप में व्यापार बना लिया है। गरीब और अज्ञानी लोगों का एक विशाल पैमाने पर इन छद्म गुरुओं द्वारा शोषण के शिकार रहे हैं। कितने शर्म की बात है! बेहतर होगा की आप भगवान कृष्ण , राम या शिव को अपने गुरु के रूप में अपने दिल की धारण करें । उनका मंत्र दोहराए और गुमराह कर रहे इन काले भेडियों से इस देश के लोगों को बचाएं । ईश्वर मेरे देश को आदि शंकर और श्री दत्तात्रेय की तरह के गुरु दे । ईश्वर इन छद्म गुरुओं के अभिशाप से मेरे देश को मुक्त करे । वह सनातन धर्म के सार्वभौमिक सिद्धांतों को विश्व में फेलाए । सभी आध्यात्मिक नेता विभिन्न संप्रदायों को एकजुट करने के लिए अपने स्तर पर कोशिश करें । उन्हें नए पंथों की स्थापना नहीं करनी है । हमेशा के लिए पंथों की लड़ाई समाप्त हो । इस देश को हमेशा संतोंए ज्ञानिओं ए त्यागियों ए योगियोंए भक्तों और संन्यासियों के एक आध्यात्मिक देश के रूप में जाना गया है । दुनिया भर में एकताए शांति और सद्भाव हो , ईश्वर हमें अध्यात्म की राह में ले चलें । गुरु वही बन सकता है जो वेद व उपनिषदों के ज्ञान का वाहक मात्र है , वह अदि गुरुवो का अनुयायी हो." स्वामी रामसुख दास जी महाराज तो सदैव एक ही बात पर बल देते थे -‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरू’ ;भगवान् श्रीकृष्णं को ही गुरू बनाओ । हम भगवान् कृष्णं को ही गरू बनाएं जिन्हें अर्जुन ने अपना गुरू बनाया और लोक और परलोक दोनों में ही विजयश्री प्राप्त हुई । उनके अनुसार आधुनिक समय में मनुष्य गुरू बनने के योग्य नहीं है ।अतः हम भगवान शिव को गुरू बनाएं । भगवती पार्वती भगवान् शिव के विषय में कहती हैं-- तुम त्रिभुवन गुरू वेद बखाना । आन जीव पांवर का जाना ।। भगवान् शिव जगत के गुरू हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरित मानस के आरम्भ में भगवान् शिव की वन्दना करते हुए लिखते हैं -- वन्दे बोधमयं गुरूं शंकर रूपिणम् यमआश्रितों ही वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्दयते । भगवान् शिव का आश्रय कर कुटिल से कुटिल चन्द्रमा भी जगत वंदनीय हो जाता है । हम भी यदि भगवान् शिव को अपना गुरू बनाएंगे तो हमारे समस्त विकारों का श मन हो जाएगा और हम भी चन्द्रमा की तरह उज्ज्वल हो जाएंगे । यदि हम चाहें तो हम हनुमान जी को गुरू बना सकते हैं वे शंकरावतार हैं । तुलसीदास जी ने भी कहा है कि:- जै जै हनुमान गुसाई । कृपा करहु गुरूदेव की नाईं ।। वे हमें अपने आराध्य ईश्ट के सन्निकट पहुंचा देना ही गुरू का मूलभूत कार्य है । जिस प्रकार से पुरोहित का कार्य वर और वधु का पाणीग्रहण करवाता है । पुरोहित के एक हाथ में वर का हाथ और दूसरे हाथ में वधु का हाथ होता है और वह दोनों का हस्त मिलाप करा देता है । ठीक उसी प्रकार गुरू का कार्य भी नर और नारायण का पाणीग्रहण करवाना होता है । गुरू के एक हाथ में नर का हाथ होता है और दूसरे हाथ में नारायण का हाथ होता है और गुरू इन दोनों का हस्त मिलाप करवा देता है । जो गुरू नर और नारायण का मिलाप करवा दे वही सच्चा गुरू है और उसे ही गुरू मानना चाहिए तथा उसे ही गुरू बनाना चाहिए ।

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