Hindu Purohit Sangh
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पुरोहित समाज कल-आज और कल


विवरण

पुरोहित समाज की जातिगत उत्पत्ति, उसके आचरण, अन्य वर्गों पर किये गये कथित अत्याचारों पर स्वयंभू विद्वानों और अवसरवादी राजनेताओं द्वारा प्रायः बेतुके बयान दिये जाते हैं। प्रस्तुत लेख इन वक्तव्यों का विरोध या चीरफाड़ करने के बजाय तथ्य और तर्क के आधार पर अपनी बात कहने का प्रयास है। यों भी मिटाये बिना किसी रेखा को छोटी करने के लिए उसके समांतर लंबी रेखा खींचने की नीति सम्मत राय है। ब्राह्मण समाज के अतीत, वर्तमान एवं अपेक्षित भविष्य की लेखक की अपनी क्षमता में ईमानदार मीमांसा का प्रयास इस लेख का उद्देश्य है। ब्राह्मण कौन है?- यस्क मुनि के अनुसार- जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः। वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।। व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है। ब्राह्मण के कर्तव्य- ब्राह्मण के कर्तव्य गिनाते हुए शास्त्र कहता है- अध्यापनम्‌ अध्ययनम्‌ यज्ञम्‌ यज्ञानम्‌ तथा। दानम्‌ प्रतिग्रहम्‌ चैव ब्राह्मणानामकल्पयात।। अर्थात्‌ अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना-यज्ञ कराना, दान लेना-दान देना ब्राह्मण के मुख्य कर्तव्य हैं। दृष्टव्य है कि समाज हित के किसी भी प्रकार के ज्ञान/उपलब्धि/जानकारी को अपने तक सीमित न रखने का स्पष्ट निर्देश ब्राह्मण को दिया गया है। यही कारण रहा कि अध्ययन के बाद अध्यापन, केवल यज्ञ करना नहीं अपितु शास्त्रोक्त रूप से कराना भी, दान केवल लेना नहीं बल्कि देना भी ब्राह्मण दर्शन में अनिवार्य समझा गया। श्रेष्ठ आचरण, अद्वैत दृष्टि और निष्ठा से कर्तव्य पालन के भाव के चलते ब्राह्मण वर्ग मानव कुल का सिरमौर बना। स्वाभाविक था कि शिक्षक, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, ज्ञानी, अन्वेषी आदि ब्राह्मण कहलाये। ब्राह्मण के स्वभाव का उल्लेख करते हुये नीति कहती है - शमोदपस्तपः शौचम्‌ क्षांतिरार्जवमेव च। ज्ञानम्‌ विज्ञानमास्तिक्यम्‌ ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌। ब्राह्मण चित्त पर नियंत्रण, इंद्रियों पर नियंत्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता एवं ज्ञान-विज्ञान में विश्वास रखने वाला ब्राह्मण होता है। अनुवांशिकता का आरोप- वैदिक संस्कृति ने जन्म नहीं अपितु कर्म के आधार पर मनुष्य को चार वर्गों में विभाजित किया है। इस वर्गीकरण के अंतर्गत श्रमिक समाज का नामकरण शूद्र किया गया। कृषि एवं व्यापार को प्रधान कर्म के रूप में अंगीकार करने वाला वैश्य बना। धर्म रक्षा का दायित्व वहन करने वालों को क्षत्रिय संबोधित किया गया जबकि अध्यात्मविद्या का उत्तरदायी ब्राह्मण कहलाया। जन्मतः जातिप्रथा को सनातन संस्कृति का मूल बताने वालों ने अपवादात्मक साहित्य को परंपरा के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। शूद्र द्वारा वेद का उच्चारण सुन लेने पर उसके कानों में पिघला सीसा घोल देने का संदर्भ देनेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही लिखे गये "सर्वेजना सुखिनो भवंतु' और "वसुधैव कुटुंबकम्‌' का संदर्भ देने से कतराते हैं। ब्राह्मण जातिगत होता, अपने तक सीमित रहता तो "सर्वेजना' के स्थान पर "ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग करता। "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' भी किसी ब्राह्मण(याने विद्वान) ने ही लिखा होगा। बौद्ध मीमांसा के अनुसार जटा, गोत्र या जन्म से नहीं बल्कि जिसमें सत्य है, धर्म है जो पवित्र है वही ब्राह्मण है। एक अन्य मत के अनुसार चर-अचर किसी प्राणी को दंड नहीं देता, न किसीको मारता है, न मारने की प्रेरणा देता है वही ब्राह्मण है। ब्राह्मणों द्वारा लिखे गये किसी भी ग्रंथ में सजातीय समाज के लिये सीधे स्वर्ग की व्यवस्था और गैर ब्राह्मणों को नर्क के हवाले करने का उल्लेख भी नहीं किया गया। स्वर्ग-नर्क का निर्धारण मनुष्य के कर्म के आधार पर किया गया। धार्मिक साहित्य ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनमें कुलीन घर में जन्म लेने वाले को नर्क और कथित अधम को स्वर्ग भेजने की गाथाएं हैं। आलोचक स्वयंवर का संदर्भ भी भूल जाते हैं। स्वयंवर समाज के हर वर्ग के लिए खुला था। अधिकांश राजाओं(क्षत्रिय) द्वारा अपनी राजकुमारी का विवाह ॠषि-मुनि (ब्राह्मण) से कराने की परंपरा को अपवाद स्वरुप भी देखने का प्रयास इन अनुसंधानकर्ताओं ने नहीं किया। राजप्रासाद की कन्या द्वारा सारे भौतिक ऐश्वर्य तजकर कुटिया में निर्धन जीवन बिताने की कल्पना करना भी आज के समय में कठिन है। वस्तुतः ये रजोगुण पर सद्‌गुण को वरीयता देनेवाले समाज का उत्कृष्ट उदाहरण है। उपरनिर्दिष्ट यस्क उवाच तो मानो इन आलोचकों ने कभी सुना ही नहीं जन्म से अब्राह्मण वाल्मीकि और विश्वामित्र के कर्म द्वारा क्रमशः महर्षि और राजर्षि की उपाधि पाने के प्रसंग भी गौण कर दिये गये। एक संदर्भ कहता है कि वेदों, पुराणों, महान्‌ पुस्तकों का ज्ञाता, पूजा-पाठ, विधि-विधान, मंत्रोच्चारण, यज्ञ, विवाह, यज्ञोपवीत आदि में दक्ष व्यक्ति पंडित होने का अधिकारी है। पर पंडित जाति से ब्राह्मण हो इसका कोई उल्लेख नहीं है। एक अन्य संदर्भ में ब्रह्मकुल शब्द का उपयोग करते हुये ब्राह्मण के ॐकार (वेद) को पिता एवं गायत्री को माता कहा गया है। हिंदुत्व में यह सिद्धांत हर अनुयायी पर लागू होता है केवल ब्राह्मण पर नहीं। आत्मबल द्वारा ब्रह्म तेज की प्राप्ति का लक्ष्य बनाने वाले को भी ब्राह्मण कहा गया है। यह सिद्धांत भी जाति से परे हर मनुष्य पर लागू होता है। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि ब्राह्मण शब्द जन्म से किसी कुल विशेष में पैदा होने वाले के लिए नहीं है। संक्रमण काल लम्बे समय तक सुख-समृद्धि-शान्ति से जीनेवाली आर्य संस्कृति कालम्तर में विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार बनी। मंदिर अपार सम्पत्ति का केंद्र थे। चूँकि लुटेरे अनार्य थे, मंदिर के प्रति कोई श्रद्धा या आस्था उनमें नहीं थी। इन मंदिरों को अनेक बार लूटा गया। विशेषकर मुगलों ने तो क्रूरता और अमानवीयता की सारी सीमाओं को पार कर दिया। गर्भगृहों को तोड़ दिया गया, सम्पत्ति पाने के लालच में मंदिर ढहाकर खुदाई की गई।ध्यान देने वाली बात ये है कि इन मंदिरों का सारा प्रबंध ब्राह्मणों के पास था। मंदिर उनकी आजीविका तथा ज्ञानार्जन के केंद्र थे। मंदिरों, उनसे जुड़े गुरुकुल, आश्रम और विद्यालयों के विनाश ने ब्राह्मण समाज का आर्थिक ढॉंचा छिन्न-भिन्न कर दिया। समाज घोर वित्तीय विपन्नता में फंस गया, रोटियों के लाले पड़ गये। उक्ति है-" भूखे भजन न होय गोपाला'। बदली परिस्थितियों में ब्राह्मण वर्ग की प्राथमिकता भी बदल गई। किसी भी तरह जीविकोपर्जन उसके लिए पहले क्रमांक पर आ गया। जिस तरह घर चलाने के लिए श्रमिक का बेटा छुटपन से ही काम करने लगता है, ब्राह्मण पुत्र भी वेद, शास्त्र,दर्शन या मीमांसा के किसी औपचारिक शिक्षण के बिना पौरोहित्य कराने लगा। समय बीतने के साथ तत्कालीन अनिवार्यता, आदत में बदल गई। परिणामस्वरुप खोखले ज्ञान और दिखावटी जानकारी वाला पुरोहित वर्ग खड़ा हो गया। ज्ञान प्रधान कर्म से ज्ञान का लोप हुआ, सहज था कि ब्राह्मण का मान भी समाज में पहले जैसा नहीं रहा। रिस्पेक्ट इज कमांडेड (सम्मान अपने कर्म से हासिल किया जाता है), नॉट डिमांडेड (मांगा नहीं जाता)। निराधार जातिगत अहम्‌ ओढ़ा अल्पज्ञानी समाज सम्मान की चाह करने लगा, ऐसे में स्थिति शोचनीय हो गई। कर्मकाण्ड के पाठ्यक्रम की आवश्यकता- इस दुर्दशा से मुक्त होने के लिए निदान ढूँढ़ना एवं उसपर अमल करना आवश्यक है। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, काशी और देश के कतिपय अन्य गुरुकुलों का अपवाद छोड़ दें तो पूरे देश में कर्मकाण्ड की विधिवत शिक्षा व प्रशिक्षण देनेवाला कोई संस्थान नहीं है। समय की आवश्यकता व मांग है कि पौरोहित्य के लिए सर्वसमावेशक मानक पाठ्यक्रम तैयार किया जाए। इस पाठ्यक्रम में षोढष संस्कारों का कर्मकाण्ड शास्त्रोक्त तरीके से सूत्रबद्ध किया जाए। भारत की बृहत्तर प्रांतीय भिन्नता को देखते हुए पाठ्यक्रम ऐसा हो जो कश्मीर से कन्याकुमारी और गंगटोक से रामेश्वरम्‌ तक मान्य हो। इस पाठ्यक्रम में प्रांतों के स्थानीय लोकाचारों का भी उल्लेख हो। एक स्वायत्त केंद्रीय मंडल बने जो इस पाठ्यक्रम के आधार पर परीक्षाओं का संचालन करे। इन परीक्षाओं को लिखित, मौखिक और प्रयोग सहित उत्तीर्ण करनेवालों को पुरोहित की मानद्‌ उपाधि दी जाए। वतर्मान सदी ज्ञान और सूचनाक्रांति की है। साथ ही एक्स्परटाइज याने अपने क्षेत्र में पारंगत होने की भी है। समुचित शिक्षा-प्रशिक्षण के बिना पौरोहित्य भविष्य में संभव नहीं हो पायेगा अतः इस विषय पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। *(1) सर्वसामान्य प्रार्थना की आवश्यकता- उदारता हिंदुत्व की मूल भावना है। अद्वैत दर्शन की इस संस्कृति ने शरणागत की विशेषताओं को अक्षुण्ण रखते हुए उसे अंगीकार कर लिया या "जाकि रही भावना जैसी' के अनुसार शरणागत के अनुरुप ढल गई । यही कारण है कि अन्यान्य क्षेत्रों में जहॉं-जहॉं भी हिंदुत्व है, वह अलग-अलग लोकाचारों और भिन्न-भिन्न प्रार्थनाओं के साथ दृष्टिगोचर होता है। बदलते समय में इस समाज को पार्थिव रूप से एकजुट रखने की आवश्यकता है। एकजुटता के लिए समान मानदंड और प्रतीक अनिवार्य होते हैं। राष्ट्र की एकजुटता और चेतन अस्तित्व के लिए ज्यों राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा के मानदंड होते हैं, उसी तरह समुदाय के लिए सर्वसामान्य प्रार्थना/आरती अनिवार्य है। अलग-अलग मंदिरों में अलग-अलग आरतियॉं सुनने को मिलती हैं। ये प्रतिष्ठित मूर्ति के अनुरुप होता है पर फिर भी एक मानक आरती / प्रार्थना होनी ही चाहिए। इस आरती के गान के बाद संबंधित देवता की आरती हो सकती है। मानक प्रार्थना के अभाव में श्रद्धालु पूजा में प्रत्यक्ष सहभाग अनुभव नहीं करता। दो-चार भक्त संबंधित आरती का गान करते हैं, शेष समुदाय मौन खड़ा रहता है। इस मौन को मुखर करना आवश्यक है। मेरे स्वर्गीय पिता परम्‌ िवद्वान आचार्य पंडित काशीलाल मिश्र का स्वप्न था कि हिंदुओं के बीच एक सर्वसामान्य मानक आरती अवश्य हो। इस स्वप्न को यथार्थ में बदलना कालानुरुप एवं दूरगामी परिणाम देनेवाला होगा। पॉंचवी जाति की संकल्पना- हिंदुओं के अपने अज्ञान, विदेशी शासकों की नीतियों और विधर्मी षड्‌यंत्रों के चलते कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था, अनुवांशिक जातिप्रधान हो गई। इस नई व्यवस्था ने हिंदु समाज के सामने धर्मपरिवर्तन की विद्रूप समस्या खड़ी की। धर्मांतरण समकालीन समाज के आगे मुँहबाए खड़ा विकट प्रश्न है। प्रश्न का समाधान पाने के लिए "थिंक टैंक' समझे जानेवाले ब्राह्मणवर्ग को समुदाय आशा से देख रहा है धर्मांतरण के कारणों की चर्चा या मीमांसा यहॉं प्रासंगिक नहीं है। यह लेख इस विषय से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान आकृष्ट करना चाहता है। मान लीजिए कि धर्मांतरित हुआ कोई व्यक्ति या अन्य धर्मावलंबी हिंदुत्व अपनाना चाहता है तो वर्तमान सामुदायिक व्यवस्था में उसकी जाति कौन सी होगी? उसके साथ रोटी-बेटी का व्यवहार कौन करेगा? समुदाय उसकी जाति तय करेगा या उसे अपनी जाति चुनने का अधिकार होगा? धर्मांतरित/संप्रति हिंदु अपनी वर्तमान जाति परिवर्तित कर दूसरी जति में जाना चाहे तो प्रक्रिया क्या होगी? इन प्रश्नों के निदान के लिए पहले से जाति प्रथा का दंश झेल रहे हिंदुत्व में क्या पॉंचवी जाति का निर्माण किया जाए? "कॉंटा कॉंटे को निकालता है' की तर्ज पर विचार तो हो ही सकता है। लेखक का मानना है कि प्रश्न हैं तो उत्तर भी होंगे। आवश्यकता है प्रश्न खड़े करने की, पियुष या हलाहल जो भी मिले मंथन तो करना ही होगा। हिंदुत्व में लौटने के इच्छुकों के परिप्रेक्ष्य में पॉंचवी जाति की संकल्पना लेखक की ओर से प्रश्न का ढूँढ़ा गया एक संभावित उत्तर है। चूँकि इस प्रश्न का कैनवास बहुत बड़ा है, अतः उत्तर भी असंख्य हो सकते हैं। इस संदर्भ के अनंत विस्तार को देखते हुए पॉंचवी जाति की संकल्पना का यहॉं उल्लेख भर किया गया है। इसपर अलग से चर्चा हो सकती है, समाज विचार करे। अंतर उपजातीय विवाह की आवश्यकता- ब्राह्मण समाज का वैवाहिक परिदृश्य विरोधाभास से भरा हुआ है। एक ओर तो लड़के/लड़की द्वारा स्वयं तय किया गया अंतरजातीय, अंतरधर्मीय, यहॉं तक कि अंतरदेशीय विवाह भी समाज स्वीकार कर लेता है। वहीं दूसरी ओर समाज का सदस्य जब खुद रिश्ते तलाशने निकलता है तो जाति, धर्म देश की तो छोड़िए, केवल अपनी उपजाति की चहारदिवारी में लड़का/लड़की ढूँढ़ता है। "गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज' का यह मानसिक रोग समझ से परे है। उपजातीय संरचना तक पहुँच रहे जातिगत कसैलेपन को रोकना होगा। भाषा, लोकाचार, बार-त्यौहार, खान-पान में समानता, उच्चशिक्षा, प्रतिष्ठित परिवार आदि के बेहतर विकल्प पाने के लिए अंतर उपजातीय विवाह समय की अनिवार्य मांग है। इतिहास साक्षी है कि बचा वही जो समय के साथ चला। तय करना है कि ब्राह्मण इतिहास रचेगा या इतिहास हो जायेगा। उपजातियों में एक दूसरे को ऊँचा-नीचा समझने की भावना विद्यमान है। एक प्रांत के ब्राह्मण द्वारा दूसरे प्रांत के ब्राह्मण को हेय समझना, उसके दुःख को अनदेखा करना दुराग्रही, दुर्भाग्यपूर्ण और अकल्पनीय है। इससे अधिक दुःखद और क्या होगा कि अपने ही देश में अपनी जन्मभूमि से बेदखल कर दिये गये कश्मीरी पंडितों के समर्थन में एक्का-दुक्का ब्राह्मण संस्थाएं ही आगे आईं। उपजातियों में समाज का बॅंटवारा हर घटक के लिए खतरे की घंटी है। उत्पीड़न का विरोध एट्रोसिटी अथवा उत्पीड़न विशेषकर शाब्दिक उत्पीड़न ब्राह्मण समाज द्वारा झेली जा रही बहुत बड़ी समस्या है। स्वाधीनता के बाद खासतौर पर पिछले लगभग तीन दशक से राजनीति कुटिल और कलुष होती गई है। समाज को विभाजित कर सत्ता टिकाये रखने के फॉर्मूले ने राजनीति को विषमता तथा भेदभाव पर केंद्रित कर दिया है। आलोचना के लिए ब्राह्मण सबसे "सॉफ्ट टारगेट' बन गया है। मौन स्वीकृतिं लक्ष्णं के अनुरूप ब्राह्मण का मौन आरोपित अपराधों पर समुदाय की स्वीकृति की मोहर लगा देता है। ब्राह्मण वर्ग को आगे आकर और खुलकर इस उत्पीड़न का विरोध करना होगा। अपमानकारक शब्दों का प्रयोग करने वालों के विरुद्ध मुकदमे दायर किये जायें। स्वजातीय चेतना के लिए गठित संस्थाएं ये काम करें या याचिकाकर्ता की सहायता करें। देशभर में ऐसे दो-तीन सौ मुकदमे भी दायर हुए तो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए अनर्गल प्रलाप करने वाले राजनेताओं और क्षुद्र स्वार्थों के लिए समाज में भेद उत्पन्न करने वालों की जबान पर लगम लग जायेगी। विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ समाज को राजनीति का उत्तर राजनीति से देना सीखना होगा। समाज का शिक्षित युवा वर्ग बड़ी संख्या में देश की राजनीतिक व्यवस्था में शामिल हो। समाज के विरुद्ध हो रहे विषैले प्रचार के सामने ब्राह्मण वर्ग की कथनी और करनी अमृत सिद्ध होगी। मंदिरों और मठों की भूमिका एक महत्वपूर्ण व संवेदनशील मुद्दा मंदिरों की संख्या और उनके रख-रखाव की है। देश भर में यत्र-तत्र-सर्वत्र छोटे बड़े असंख्य मंदिर हैं। इनमें से सड़क के किनारे या किसी खास स्थान के आसपास खड़े किये गये मंदिरों में न तो कलशारोहण हुआ है, न ही मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई है। इन सारे मंदिरों को एक व्यवस्था के अंतर्गत एक छत्र के नीचे या चार पीठों में से किसी एक ( मंदिर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार) के अंतर्गत लाया जाना चाहिये। मंदिरों में चर्च की तर्ज़ पर सदस्यता पर विचार भी किया जा सकता है। हर मंदिर में एक साप्ताहिक आयोजन अवश्य हो, सदस्य के घर के सुखद प्रसंगों पर उत्सव हो, दुखद प्रसंगों में अन्य सदस्य शोक बॉंटने में सहभागी हों। मंदिरों में मूर्ति पर चढ़ावे की पद्धति पूरी तौर पर बंद हो, दानराशि केवल दानपात्र में ही डाली जाये। अंधविश्वास के चलते बलिप्रथा का चलन जिन मंदिरों में अब भी जारी है, वहॉं इस प्रथा को तुरंत बंद कराया जाये। अनेक तीर्थस्थानों और श्रद्धालुओं की मान्यता वाले मंदिरों में पंडे धर्म के नाम पर जबरन वसूली करते दिखाई देते हैं। ये वसूली पंडों के प्रति वितृष्णा तो पैदा करती ही है, श्रद्धालु के मन में धर्म के प्रति उदासीनता का भाव भी जगाती है। लेखक को इस बात का भली-भॉंति संज्ञान है कि अधिकांश लाभार्थियों का इन सुझावों से विरोध होगा। पर समय-समय पर विकृतियों की शल्यचिकित्सा किये बिना समाज और धर्म निरोगी नहीं रह पायेंगे। चूँकि मंदिरों की कमान ब्राह्मण वर्ग के हाथ में है, अत: चीरा लगाने की पहल भी हमें ही करनी होगी। विश्व का सबसे पुराना धर्म होने के कारण हमारे मठों में अकूत सम्पत्ति जमा है। कुछेक मठों में अन्नदान और गुरुकुल ( वह भी बेहद छोटे स्तर पर) छोड़ दें तो अधिकांश में कोई विशेष गतिविधि दिखाई नहीं देती। आज के समय में शिक्षा सबसे महंगा उद्योग हो चला है। अंग्रेजी शिक्षा ने तो छात्रों को जड़ों से ही काट दिया है। भाषा संस्कार की वीणा और संस्कृति की वाणी है। हमारे मठों को भारतीय भाषाओं में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्यालय-महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र आरंभ करने चाहिएं। इनमें माध्यमिक शिक्षा विभिन्न भारतीय भाषाओं(प्रदेश के अनुसार) में दी जानी चाहिए जबकि उच्च शिक्षा का माध्यम हिंदी हो। इन संस्थानों में संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य हो। ज्योतिष के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अनुसंधान केंद्र खोले जाएं। अंतरराष्ट्रीय संवाद कक्ष स्थापित किये जा सकते हैं। सभी संस्थानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाये। ऑनलाइन स्टडी सेंटर हों। फेसबुक, ट्‌विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स का उपयोग हो। यदि ये विचार आंशिक रूप से भी अमली जामा पहनता है तो समाज और देश का भला होगा। भूमंडलीकरण के सामने भारतीयकरण हिमालय-सा खड़ा होगा। समुदाय अपनी सांस्कृतिक चेतना को जागृत रूप में देख पायेगा और संबंधित संस्थानों को आमद तो होगी ही। बौद्धिक संपदा की धरोहर वाले समाज को पोषक वित्त उपलब्ध हो तो कोई आश्चर्य नहीं कि एक पीढ़ी बाद देश बदला हुआ दिखाई देने लगे। आत्मचिंतन समुदाय व्यक्तियों का समूह है। व्यक्ति स्वयं को परिवर्तित करे तो समुदाय में परिवर्तन स्वयंमेव आरंभ हो जाता है। परिवर्तन हेतु आत्मचिंतन आवश्यक है। पहला संदर्भ ब्राह्मणों की रसोई का है। अनेक ब्राह्मण परिवारों का खानपान बिगड़ गया है। शराब का प्रवेश बेखौफ हो चुका है। चोरी छिपे मांसाहार भी किसी से छिपा नहीं है। समाज में ये अवगुण आये कैसे? स्पष्ट है कि परिवार द्वारा दिये गये संस्कारों में कमी रही,कुसंग रहा। अधिकांश ब्राह्मण घरों में कोई नियमित यज्ञ, सत्संग, धार्मिक लोकाचार होता नहीं दिखता। बच्चों की तो छोड़िये, उनके माता-पिता भी वेद, वेदांग, उपनिषद, पुराण की सही संख्या नहीं जानते। रूढ़िवादी घरों में आज भी शकुन के कार्यों में विधवाओं और नि:संतान महिलाओं को टाला जाता है। कन्या के जन्म पर दुखी होनेवाले अभागों की कमी नहीं। सम्पन्न परिवार भी दहेज के लालच से मुक्त नहीं हैं। मृत्युभोज की प्रथा धड़ल्ले से जारी है। परिवार पर जान छिड़कने वाला, सबका हितैषी, अपनी मृत्यु के बाद पितर बन कर अपने ही परिवार का बुरा नहीं कर सकता, जैसी सामान्य बात नहीं समझने वालों का प्रतिशत भी बड़ा है। समुदाय के एक हिस्से का इस तरह का आचरण पूरे समुदाय को लज्जित करता है। सजातीय चेतना की आवश्यकता सारी विसंगतियों के बीच अपने नैतिक आचरण का आदर्श प्रस्तुत कर सकनेवाले सच्चे ब्राह्मणों को समाज का नेतृत्व करने के लिए आगे आना चाहिए। महात्मा बुद्ध के अनुसार कमल के पत्ते पर जिस तरह पानी या आरे की नोक पर सरसों का दाना अलिप्त रहता है, ठीक उसी तरह से भोगों से अलिप्त रहने वाला ही सच्चा ब्राह्मण है। प्राचीनकाल में धर्मगुरुओं द्वारा शासक की प्रसन्नता अप्रसन्नता की चिंता किये बिना तथ्य, तर्क और दर्शन के आधार पर समाज का मार्गदर्शन करने का आदर्श उदाहरण हमारेे सम्मुख है। नेतृत्व जड़ता से नहीं होता। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों ने भगवान को मंदिर से बाहर लाकर रथ में बैठाकर आम जनता के बीच ले जाना आरंभ किया है। जिस काल में भगवान को भी अपना आसन छोड़कर बाहर आना पड़ रहा हो, उसमें घर बैठे कुछ नहीं होगा। सामयिक धर्म का पालन करने सच्चे ब्राह्मण को सामाजिक समरसता का संदेश लेकर घर से बाहर निकलना ही होगा। समय सतत परिवर्तनशील है। गीता के दसवें अध्याय में भगवान कहते ह कि परिवर्तनशीलों में मैं समय हूँ। संकेत स्पष्ट है। बौदि्‌धक चर्वण मात्र से कुछ नहीं होगा। घटी-पल नष्ट किये बिना ब्राह्मण तुरंत सक्रिय हो। कहा भी गया है- या क्रियावान सा पण्डिता। अर्थात विद्वान वही है जो क्रियावान है। ब्राह्मण की सक्रियता की देश और समाज बाट जोह रहा है। प्रस्तुतकर्ता

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