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व्रत और उपवास ( Fasting among Hindus)


विवरण

हिन्दु्ओं के आठ प्रमुख कर्तव्य है:- 1.संध्योपासन, 2.व्रत, 3.तीर्थ, 4.उत्सव, 5.सेवा, 6.दान, 7.यज्ञ, और 8.संस्कार।व्रत और उपवास का हमारी हिंदु संस्कृति में विशेष स्थान हैं। व्रतों विस्तृत वर्णन पुराणों मिलता हैं। व्रत और उपवास में सबसे श्रेष्ठ प्रत्येक माह की एकादशी और श्रावण माह के प्रत्येक दिन को पवित्र और व्रत लायक माना गया है। प्रत्येक हिन्दू को उक्त दिन खुद को पवित्र रखकर इनका पालन करना चाहिए। उपवास को हम यहां अनाहार के अर्थ में लेते हैं। उपवास एक प्रकार की शक्ति है जिसके बल से जहां रोगों को दूर कर सेहतमंद रहा जा सकता है, वहीं इसके माध्यम से सिद्धि और समृद्धि भी हासिल की जा सकती है। उपवास या व्रत का अर्थ बहुत व्यापक है। शास्त्रों में मुख्यत‍: 4 तरह के व्रत और 13 तरह के उपवास बताए गए हैं। बहुत से तपस्वी अपने तप की शुरुआत उपवास से ही करते हैं। संकल्पपूर्वक किए गए कर्म को व्रत कहते हैं। किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दिनभर के लिए अन्न या जल या अन्य तरह के भोजन या इन सबका त्याग व्रत कहलाता है। व्रत धर्म का साधन माना गया है। उपवास का अर्थ होता है ऊपर वाले का मन में निवास। उपवास को व्रत का अंग भी माना गया है। व्रतों के प्रकार : व्रत और उपवास के कई प्रकार हैं। वेदों में अलग और पुराणों में अलग। सूर्य और चंद्र तिथि अनुसार व्रतों के कई प्रकार बताए गए हैं। हालांकि सभी तरह के व्रतों को मुख्यत: 3 भागों में बांटा जा सकता है और उपवास को 13...। व्रत के तीन प्रकार- 1.नित्य, 2.नैमित्तिक और 3.काम्य 1.नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है। 2.नैमिक्तिक व्रत उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत हैं। 3.काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं। उपवास के प्रकार- 1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास, 5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास, 9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास, 13.दीर्घ उपवास।( संदर्भ - वेब दुनिया). यदि आप उपवास नहीं कर सकते, तो कृपया न करें. अपनी शारीरिक क्षमता और स्वस्थता का ध्यान रखकर ही आप अपने उपवास की अवधि चुनें.व्रत से मनुष्य की अंतरात्मा शुद्ध होती है, साथ ही एकाग्रता, बुद्धी, ज्ञानषक्ति, विचारषक्ति, संयमषक्ति और पवित्रता आदि जैसे सद्गुणों विकासित होते हैं। व्रत के प्रभाव से आत्मा निर्मल और सबल होती हैं। उपवास के साथ साथ परमेश्वर से प्रार्थना भी करनी चाहिए. नीचे कुछ मार्गदर्शन दिए हए हैं: १. उपवास के दौरान २ से ३ लीटर पानी पीएँ ताकि कोई समस्या न हो. २. यदि आपको स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या है और दवाई ले रहे हैं, तब हम सलाह देते हैं कि आप अपने डॉक्टर से परामर्श करें कि क्या आप किसी भी काल का उपवास कर सकते हैं या नहीं. हर प्रकार के उपवास के लिए यह याद रखें कि आप केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं. इसलिए लोगों के बीच घमंड न दिखाएँ कि आप उपवास कर रहे हैं, क्योंकि उपवास का अर्थ है अपने आपको परमेश्वर के सामने नम्र करना ताकि पिछली गलतियों के लिए पश्चाताप कर सकें. इस समय दूसरों के साथ बातचीत को सीमित रखें और देश की हालत के लिए परमेश्वर से अपना दुख व्यक्त करें और हमारी इस कठिन समय में उनसे दया तथा कृपा की माँग करें. -सबेरे जल्दी उठें। नित्यकर्म और स्नान करें। - व्रत-उपवास यथा संभव अन्न न खाएं। - स्वभाव के स्तर पर अपने गुस्से, आवेश, कटु बोल से बचें। वासना, उत्तेजना पैदा करने वाली सोच से दूर रहें। - शांत स्थान पर कुछ देर बैठकर ध्यान करें। - आप जिस भी देवता में आस्था और श्रद्धा रखते हों, जहां भी समय मिले उनका नाम स्मरण करें। चैत्र मास में वत्सराध्व्रत, वैशाख मास में स्कंदषष्ठ्व्रत, ज्येष्ठ मास में निर्जला एकादशी व्रत, आषाढ़ मास में हरिशयन्व्रात, श्रावण मास में उपाकर्म व्रत, भाद्रपद मास में स्त्रियों के लिए हरितालिका व्रत, आश्विन मास में नवरात्र व्रत, कार्तिक मास में गोपाष्टम व्रत, मार्गशीर्ष मास में भैरवाष्टम्व्रत, पौष मास में मार्तंड व्रत, माघ मास में षट्तिल्व्रत, और फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि व्रत प्रमुख हैं। महालक्ष्मी व्रत, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को प्रारंभ होकर सोलह दिनों में पूर्ण होता है। प्रत्येक संक्रांति को आचरणीय व्रतों में मेष संक्रांति को सुजन्मावाप्ति व्रत, किया जाता है। तिथि पर आश्रित रहनेवाले व्रतों में एकादशी व्रत किया जाता है। तिथि पर आश्रित रहनेवाले व्रतों में एकादशी व्रत, वार पर आश्रित व्रतों में रविवार को सूर्य व्रत, नक्षत्रों में अश्विनी नक्षत्र में शिव व्रत, योगों में विष्कुंभ योग में धृतदान्व्रात, और करणों में नवकरण में विष्ण्व्रुात का अनुष्ठान विहित है। भक्ति और श्रद्धानुकूल चाहे जब किए जाने वाले व्रतों में सत्यनारायण व्रत प्रमुख है। भारत में आमतौर पर व्रत उपवास के समय सेधा नमक, साबूदाने का प्रयोग, शाकाहार या फलाहार किया जाता है .तर्पण, होम कर भी कर सकते हैं परमेश्वर आपको आशीष दे!

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