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पुत्रि -पुत्रवति भव: Putri-Putravati bhavah


विवरण

पुत्रि -पुत्रवति भव: कई बार जब कोई महिला किसी पुरोहित या बुजुर्ग के सम्मान में पांव छुते हैं तो आर्शीवाद स्वरुप लगभग सभी महिला को पुत्र वति भव: का आर्शीवाद देते हैं । कभी नहीं सुना कि किसी ने पुत्रि -पुत्रवति भव: का आशीर्वाद दिया हो । एक और आर्शीवाद देते सुना है – दुधो नहाओ पुतो फ़लो । भारतीय समाज में नारी का महत्व केवल सैद्धान्तिक रुप में ही है। इसका व्यवहारिक रुपान्तरण बिल्कुल अलग हैं । हमने देखा है कि मां दुर्गा , मां काली, मां वैष्णो देवी की फोटो लगभग हर घर के पुजाघर मे मिलती है परन्तु व्यवहारिक जीवन में नारी ( पुत्रि, मां , बहन, पत्नि ) के रुप मे उस प्रकार का महत्व नहीं मिलता हैं । अथर्ववेद में यज्ञ करने वाले के लिए पुत्री की कामना की गयी है , वैसे भी हिन्दू धर्म ग्रंथों में पुत्र या पुरुष शब्द शब्द महिला तथा पुरुष दोनों के लिए प्रयुक्त हुवा है महत्व कम होने के व्यवाहरिक कारण है जैसे पुत्रि के विवाह में दहेज देना, पुत्रि का पिता की सम्पति में हिस्सा ना मिलना , शादी के बाद पुत्रि का पिता के घर से पति के घर आना , शादी के बाद पुत्रि के सरनेम मे बदलाव । नारी की पहचान आज भी पुरुषो से ही होती है उदाहरण के तौर किसी भी फ़ोर्म में आवेदिका का नाम के आगे पिता का नाम या पति का नाम लिखना पड़ता है । हमें सिस्टम में परिर्वतन लाना होगा और नारी हो या पुरुष सबकी पहचान माता के नाम से होनी चाहिए । आवेदक / आवेदिका का नाम के आगे माता का नाम मांगना चाहिए क्योंकि यह प्राकृतिक रुप से भी सही है , नारी ही सबको जन्म देती है । वर्तमान परिस्थितियों पुत्र भी अपनी व्यवसायिक मजबूरियो के कारण माता पिता के साथ नहीं रह पाता है व सेवा नहीं कर पाता है । अत: ये मानना कि पुत्र बुढापे मे मां बाप की सेवा कर पायेगा ठीक नहीं है । पुत्र की तुलना मे पुत्रिया अपने मां बाप से भावनात्मक रुप से ज्यादा जुड़ी होती है व पुत्र की अपेक्षा ज्यादा देखभाल करती है । अब बदलने की जरूरत है . पुरोहित अब पुत्रि -पुत्रवति भव: ही आर्शीवाद देेेे'। हर जनम मोहे बिटिया ही दिजो

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