Hindu Purohit Sangh
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हिन्दू धर्म

हिन्दू शास्त्रों में मानव की संकल्पना अपरिमित एवं उदात है। किसी भी धर्म में सृष्टि व नियति के बारे में इतनी श्रेष्ठ अवधारणा नहीं मिलती। महान दार्षनिक हेनरी थौरो

दुनियां में कोई भी धर्म दर्षन वेदों के समान भव्य और मुक्तिदाई नहीं है। एक दिन यह दर्षन यूरोप आएगा और अपनी ज्ञान धारा से हमें अभिभूत करेगा। जर्मन विद्वान शोपनहावर हिन्दू प्राचीनतम धर्म दर्षन है और सनातन (आदि-अन्त रहित) धर्म होने के कारण यह सभी धर्मों की जननी है। हिन्दू षब्द प्राकृत भाषा का है जो उस ’सप्त सिन्धु’ शब्द से निकला है जिस नाम से ऋग्वेद काल में लोग अपने देष को पुकारते थे। हिन्दू धर्म का विकास भारत में हुआ यद्यपि आज यह वैष्विक स्वरूप ले चुका है। हिन्दू अपने पवित्र ग्रंथ वेद तथा उपनिषदों को देवीय उत्पत्ति का मानते हैं, इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है। इसके अतिरिक्त प्राग्वैदिक उत्पत्ति के ग्रन्थों को स्मृति कहा जाता है जो देवीय उत्पत्ति के नहीं माने जाते, लेकिन इन्हें भी पवित्र माना जाता है। हिन्दू एक परमात्मा के अस्तित्व पर विष्वास करते हैं जो ईष्वर कहलाता है। ईष्वर निराकार, अजन्मा तथा आदि-अन्त रहित है तथापि वह स्वरूप लेने में सक्षम है। वेदों में ईष्वर को ब्रह्म नाम दिया है जिसकी ‘ सत् चित आनन्द ’ अथवा ’सत्यम-षिवम्-सुन्दरम्’ कहकर व्याख्या की है अर्थात वह सत्य स्वरूप है, चैतन्य है तथा परमानन्द है। ये शाष्वत नियम है। स्मृति-ग्रंथों में षिव तथा विष्णु के रुप में ईष्वर की स्तुति की गई जिनकी संयुक्त शक्ति को दुर्गा कहा गया और मातृषक्ति के रुप में उनकी उपासना की गई। नवरात्रि व दुर्गा पूजा में असुरों के ऊपर माँ दुर्गा की विजय का त्यौहार मनाया जाता है। पौराणिक स्मृति ग्रंथों में त्रिमुर्ति के रुप में ब्रह्मा को ब्रह्माण्ड के सृजन, विष्णु को संरक्षण तथा षिव को संहार की भूमिका में एक रूपाकार देखा गया। यदि सृष्टि के संचालन में व्यवधान हो तो विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। अभी तक भगवान विष्णु नौ अवतार ले चुके हैं और दषवां अवतार कलियुग के अंतिम चरण में उत्पन्न होगा जिसको कलकी अवतार कहा गया है। इनमें श्री राम और श्री कृष्ण विष्णु के पुर्णावतार कहे गये हैं। त्रिमूर्ति की शक्तियां क्रमषः सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती कहलाती है। लेकिन गहन दृष्टि से देखने पर हम पाते हैं कि सभी स्वरूप एक के ही हैं। षिव तथा विष्णु को शंकरनारायण या हरिहर भी कहा गया है। अतः यह विभेद मात्र नाम का है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस विभेद को नहीं मानेगा उसकी आयु बढ़ेगी। इसी प्रकार ईष्वर के अन्य स्वरूप भी उनके विभिन्न नामों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। यदि हम निराकार रुप में षिव या विष्णु को देखते हैं तो वह एक आत्मस्वरूप, चैतन्य स्वरूप है और उनको मूर्त रुप में देखें तो वे मानव श्रेणी के भगवान हैं। जहां वेदों में निराकार ईष्वर की ओर संकेत है वहीं श्रुति गं्रथों में ये श्रेष्ठ मानव रुप में पूजे गए हैं। मूर्त रुप को निराकार तक पहुंचने का माध्यम मात्र माना जाता है। ईष्वर प्राप्ति के लिए भी वैदिक व प्राग्वैदिक गं्रथों में अलग-अलग मार्ग बताए गए हैं। इस संदर्भ में भागवत् गीता, जो हिन्दुओं का पवित्रतम ग्रंथ है, एक विषेष स्थान रखता है, क्योंकि इसमें वेदों का कर्म मार्ग, उपनिषदों का ज्ञान मार्ग तथा प्राग्वैदिक भक्ति मार्ग तथा राजयोग की धारायें एक जगह विलीन हो जाती हैं। इस गं्रथ के बाद यह पूछना व्यर्थ हो जाता है कि कौन सा मार्ग प्रमुख है। वेद, उपनिषद व गीता अपौरुषेय हैं जबकि स्मृति ग्रंथों की उत्पत्ति षिव व विष्णु से हुई है। भक्ति मार्गीय धारा स्मृतियों, जैसे पुराणों में मिलती है जो आर्य, आर्योत्तर व प्राग्वैदिक तीनों परम्पराओं को समाये है। गीता में ईष्वरीय वाक्य हैं अतः एक उपनिषद के रुप में श्रुति ग्रंथ होते हुए भी भागवत होने के कारण स्मृति ग्रंथ की कोटि में आ जाती है, अर्थात इस प्राचीन गं्रथ के परे कुछ नहीं है। सनातन धर्म में वैष्णव तथा शैव दो प्रमुख मार्ग रहे हैं। सनातन धर्म के इतिहास में षिव, श्री राम तथा श्री कृष्ण सर्वाधिक लोकप्रिय नाम रहे हैं। षिव को देवाधिदेव कहा जाता है जो मानव इतिहास में पूजे गए प्राचीनतम भगवान रहे हैं। भारत में सर्वाधिक मंदिर षिव को ही समर्पित हैं। उन्हें ओंकार स्वरूप भी माना गया और त्रिकालदर्षी भी कहा गया। इसी प्रकार श्री राम की भक्ति निर्गुण व सगुण दोनों मार्गों से होती आई है। कबीर, नानक व रहीम ने राम को निर्गुण व निराकार रुप में पूजा अर्थात उनके राम अयोध्या के राजकुमार दषरथ के पुत्र से भिन्न हैं, वे तो अकाल, अजन्मा, अनाम और अरुप हैं। राम कितने लोकप्रिय रहे हैं इसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि सदियों से अधिकतम हिन्दुओं के नाम के साथ ’राम’ शब्द को जोड़ने की परम्परा रही है। लोग एक-दूसरे का अभिवादन ’ राम-राम ’ कहकर करते हैं तथा मृत्योपरांत अंतिम यात्रा में राम नाम की सत्यता का बखान होता है। यहां तक कि हिन्दुओं का मानना है कि वह व्यक्ति ईष्वर को प्राप्त होता है जो मृत्यु के समय अंतिम शब्द के रुप में ’राम’ पुकारता है। गांधीजी के अंतिम शब्द ’हे ! राम’ थे। हिन्दुओं के अन्य अनेक देवी-देवता षिव या विष्णु के स्वरूप मात्र हैं। अतः हिन्दुओं को किसी एक रुप में ही ईष्वर को देखना व पूजना चाहिए। इसलिए कहा गया है कि:- ’सर्वदेव नमस्कारम् केषवम प्रति गच्छति ’ इसी बात को दूसरे शब्दों में ’ इक आंेकार सतनाम ’ कहा गया है। हिन्दू धर्म बहुदेववादी नहीं है यहां एक ही ईष्वर की आराधना होती है। ईष्वर अपने शक्ति रुप में दुर्गा हैं तो सम्पन्ना के रुप में वे लक्ष्मी हैं, जहां जीवन को पर्व तथा गीत गाते मन की बात है, और 64 कलाओं की बात है तो श्री कृष्ण हैं और जहां मर्यादा स्थापित करने वाले रुप में ईष्वर की आराधना करनी है तो यह श्री राम हैं। हिन्दू जीवात्म वाद में विष्वास नहीं करते तथा यहां नष्वर तथा मृत व्यक्ति की पूजा भी वर्जित है। अतः नष्वर की मूर्ति बनाकर पूजा करना, उसे देवी-देवताओं के साथ रखना, उनकी समाधि बनाना या मंदिर बनाने का धर्म में विधान नहीं है, क्योंकि वह ईष्वर का अंष मात्र है, यद्यपि अज्ञानवष कुछ लोग ऐसा करते पाए गए हैं। इसी प्रकार किसी भी स्परूप में की गई पूजा का लक्ष्य ईष्वर ही होना चाहिए। गुरु का आदर भी उसमें स्थित देवत्व का ही है। मूर्ति, शालीग्राम या लिंग विग्रह माध्यम के रुप में ही चित्त वृत्ति के लिए हैं। गीता में ईष्वर ने सभी धर्म पंथों को त्यागकर उनकी शरण में आने को कहा है:- सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच।। हिन्दुओं में ईष्वर की संकल्पना है कि वह एक है, लेकिन उसमें अनेक रुपों में स्वयं को अभिव्यक्त करने की योग्यता है। अतः उसकी भक्ति सगुण रुप में भी षिव, राम, कृष्ण या दुर्गा नाम से हो या इन्हीं नामों से निर्गुण निराकार रुप में हो। कोई अपनी भक्ति में साकार से निराकार की ओर जाये या कोई निराकार से ही अपनी भक्ति प्रारंभ करे इसमें कोई निषेध नहीं है। ईष्वर स्त्री-पुरुष लिंग भेद से परे है तथापि उसने स्वयम् को द्विधा विभक्ति से पुरुष व प्रकृति (मातृषक्ति) का रुप धारण किया। सनातनी (वेदान्ती, निर्गुणी तथा योगी को छोड़कर) ईष्वर को दैहिक रुप में, अर्थात देवी या देवता के स्वरुप में (मूर्तिपूजा नहीं) पूजते हैं। कोई मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान के बाद ही देवी-देवता के रुप में पूजी जा सकती है। कोई देवी विग्रह जिससे प्राण प्रतिष्ठान हुई हो अथवा जिसको अपवित्र कर दिया हो वह पत्थर तुल्य ही है। इसीलिए हिन्दू किसी संग्रहालय में रखी देव मूर्ति की पूजा नहीं करते। षिव की देवमूर्ति रुप में पूजा का विधान न होकर चैतन्य स्वरूप लिंगम (चिन्ह) के रुप में पूजा विधान है। विग्रह रुप में ईष्वर की पूजा को उपासना का प्रारंभिक स्वरूप माना है। ज्ञानी व्यक्तियों को इस अवस्था की आवष्यकता नहीं भी हो सकती है। तथापि श्रद्धा है तो वह मूर्ति में प्रवेष कर सकता है और उपासको के दुःख निवारण कर सकता है, इसी को प्रभु की लीला कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि सिद्धि विनायक, पण्डरपुर, तिरुपति, कामाक्षी, दक्षिणेष्वर, सोमनाथ, देवघर, महाकालेष्वर, गुरूवयूर ओंकारेष्वर, चिन्नकेषवा, वृहदेष्वर, रामेष्वर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, पालिताना, स्वर्ण मंदिर, महाबोधि मंदिर गया, वैष्णों देवी, बद्री-केदार, पषुपतिनाथ, काषी विष्वनाथ, द्वारिकाधीष, जगन्नाथपुरी, छतरपुर, अक्षरधाम, वृहदेष्वर, सबरीमाला, मुरगन, श्रीकालहस्ति, मीनाक्षी मंदिर मदुरई, पद्मनाभ, श्रीसेलम, कालीघाट, अमरनाथ जैसे मंदिरों में प्रत्यक्ष ईष्वर रहते हैं। विदेषों में भी अनेक जाग्रत मंदिर हैं। चार धाम (बद्रीनाथ, द्वारिका, पुरी, रामेष्वरम्) की यात्रा को हिन्दुओं के लिए पुण्यकारी बताया है। इसी प्रकार अयोध्या, वृदावन, गया, गंगासागर, वाराणसी, हरिद्वार, नासिक, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, मथुरा, मानसरोवर भी पवित्र स्थान है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों (द्वारिका, पुरी, श्रृंगेरी व जोषीमठ) के प्रति श्रद्धा का अहम महत्व है। ये मठ यह दर्षाते हैं कि हिन्दू एक दर्षन तंत्र के साथ एक संगठित धर्म है। हिन्दू धर्म में एकता लाने हेतु आदि शंकराचार्य ने चार मठों के अतिरिक्त साधु-संतों के सात अखाड़ों की भी स्थापना की। ये अखाड़े सन्यासी (षिवभक्त) तथा वैरागी (विष्णु या राम-कृष्ण) मत के हैं। अखाड़ा मूलतः आध्यात्मिक शास्त्रार्थ का मंच है। ’ अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ’ सभी अखाड़ों का संगठन है। कुंभ मेले में सभी अखाड़ों का संगम होता है।

हिन्दुओं में शरीर को उसके प्राकृतिक रुप में रखना तथा वस्त्र धारण न करना त्याग का परिचायक है और त्याग को जो अन्य अनेक प्रकार से हो सकता है, दैवीय माना है। त्याग का तात्पर्य निर्लिप्तता या साक्षी भाव से भी है अतः दिगम्बर का अर्थ है कि दिषायें ही जिनके वस्त्र हैं। इसी प्रकार दान का भी विषेष महत्व है। सम्पन्न होना एक वरदान है और सम्पन्न रहते हुए त्याग विषेष फलदायी है। सनातन धर्म नये विचारों हेतु खुला है, इसमें वाद व प्रतिवाद को प्रमुख स्थान मिला है जिससे वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला है। आध्यात्मिक क्षेत्र में नये अविष्कारों की स्वतंत्रता सनातन धर्म की एक प्रमुख विषेषता है। सनातन धर्म के कई आयाम हैं यह एक जीवन पद्धति है, एक मूल्य श्रंखला है और शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उत्थान हेतु एक दर्षन है। हिन्दू का अपने ईष्वर के प्रति संबंध एक स्नेही पिता या माँ और उसकी संतान का है, एक अनन्य मित्र का है और सहोदर का है। इसमें भय का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि यह संबंध मालिक व प्रजा या सेवक का नहीं है।

हिन्दू एक-दूसरे को अभिनन्दन करते समय दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार या नमस्ते कहते हैं या राम-राम कहते हैं। यह अभिनन्दन व्यक्ति में स्थित देवत्व का होता है न कि नष्वर व्यक्ति का। सन्त पुरुषों को यह अभिवादन शीष झुकाकर होता है, क्योंकि उनमें देवत्व अधिक है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि ईष्वर की प्रभुत्ता का क्षेत्र अनन्त है, अपरिमित है अर्थात ’ हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता ’। किसी धर्म में सृष्टिकर्ता व उसकी सृष्टि के बीच संबंध एक विषेष महत्व की अवधारणा है और हिन्दू धर्म में रचना को रचयिता का ही अंग माना है अर्थात जीव परमात्मा का अंष है, लेकिन वह ईष्वर न होने के कारण सर्वव्यापी नहीं है। इसीलिए यहां अवतार की अवधारणा है न कि दूत की। सृष्टा व सृष्टि के बीच सतत् आवागमन रहता है। रामानुजम के अनुसार जीव, प्रकृति तथा ईष्वर तीनों अनादि हैं, किन्तु जीव व प्रकृति अनिवार्य रुप से ईष्वर पर आश्रित हैं।

प्रकृति अर्थात धरती को जननी माना गया है अतः इसके दोहन या शोषण का प्रष्न नहीं उठता। इस महान दृष्टि के चलते हिन्दू धर्म में अहिंसा का भाव उत्पन्न हुआ। हिंसा को आध्यात्मिक उन्नति में बाधा माना गया। प्राग्वैदिक गं्रथों में षिव, श्री राम, श्री कृष्ण तथा देवी की पूजा को स्थान मिला जिसमें अन्यायी के विनाष को आपद धर्म मानकर आवष्यक माना तथा धर्म की स्थापना पर जोर दिया गया। इसीलिए सीता मां के अपहरण पर श्री राम ने राक्षसों का समूल नष्ट कर दिया तथा श्री कृष्ण ने कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई तथा कौरवों के अन्याय को समाप्त किया और धर्म स्थापना हेतु युद्ध तक करने का आदेष दिया। अतः धर्म संस्थापना सभी हिन्दुओं का पावन कर्तव्य है, क्योंकि यह ईष्वर को प्रिय है।

ईष्वर की सृष्टि में लाखों ग्रह तथा ब्रह्माण्ड आते हैं जिसके संचालन हेतु उन्होंने अपने सहायक नियुक्त किए हैं जिन्हें देवता कहते हैं। देवता ईष्वर नहीं, बल्कि महान आत्माएं हैं। सूर्य, चंद्र, इन्द्र, यम आदि देवता हैं। देवताओं की पूजा का विधान नहीं है। शास्त्रों में 33 करोड़ देवताओं की जो बात है वे महान आत्मा वाले जीव हैं जिनमें ईष्वरीय गुण विद्यमान हैं। उपनिषदों का महावाक्य ’अहम ब्रह्मास्मि ’ का तात्पर्य है कि मनुष्य में ईष्वर का अंष है इसे अद्वैत दर्षन कहते हैं। कुछ मनीषियों का कथन है कि प्रत्येक जीव में देवत्व नहीं बल्कि देवत्व की संभावना है। आत्मा ही महत्वपूर्ण है, शरीर नष्वर है जो पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाष) से बना है और इन्हीं में मिल जाता है। आत्मा अजर-अमर है। हिन्दुओं में दाह संस्कार करना शरीर व आत्मा की निर्लिप्तता को दर्षाता है। आत्मा अनेक शरीर बदलती रहती है। मृत शरीर का दाह आत्मा की मुक्ति दर्षाता है तथा अग्नि की ज्वाला से वह सृष्टिकर्ता ब्रह्म में जा मिलती है। शरीर में जबतक आत्मा है वह पवित्र है और आत्मा गई तो यह खण्डहर है, अपवित्र है। इसी अवधारणा के चलते हिन्दू पुराणों तथा इतिहास के ग्रंथों में कहीं भी लेखक का नाम नहीं लिखा गया है, क्योंकि वह आत्मा थी जो न कभी जन्म ली और न कभी मरी। वह ईष्वर का अणु था अतः लेखक नष्वर है कर्ता ईष्वर है।

हिन्दुओं में देवताओं को जीव-जन्तु पषु रुपों में भी दिखाया गया है, क्योंकि ईष्वर की सृष्टि धरती के मनुष्यों तक या एक ब्रह्माण्ड तक सीमित नहीं है बल्कि अनन्त ब्रह्माण्डों और सभी जीव-जन्तुओं तक है। ईष्वर की भक्ति से तथा सद्कर्म से मोक्ष प्राप्त होता है और वर्तमान जीवन भी सुख व समृद्धिपूर्ण बनता है। अर्थात लोक व परलोक दोनों ही सुधारते हैं।
मानव योनि में आपके जन्म से यह सिद्ध होता है कि आप सौभाग्यषाली हैं, क्योंकि यह आपके पुण्य कर्मो से ही संभव है। इसलिए भी सौभाग्यषाली हैं कि आप मानवता के प्राचीनतम एवं महानतम् दर्षन के उत्तराधिकारी हैं जिस धर्म में आपको अपने देवी-देवता तथा दर्षन की धारा में चयन की स्वतत्रता है। कोई भी स्वाधीनता आराधना की स्वाधीनता से बड़ी नहीं होती।

आज इस बात की प्रतिज्ञा लेनी है कि हर हिन्दू अपने धर्म से जुड़े और संस्कारों व अर्थपूर्ण कर्मकाण्डों की ओर मुख करके अपनी श्रद्धा बढ़ाए तथा एक संपूर्ण जीवन निर्वाह करेंगे। इसी प्रकार इन संस्कारों के गहन अर्थ को समझें उदाहरणार्थ हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार है न कि संविदा और पति-पत्नी के संबंध जन्म जन्मान्तर के हैं जिनमें विच्छेद संभव नहीं है। संस्कारों की पूर्ति हेतु विवाह भी आवष्यक है। इसी प्रकार पुत्री का विवाह भी एक पवित्र दान माना गया है जिसे केवल सुयोग्य, स्वधर्मनिष्ट व कुलीन व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए। गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों में उत्तम माना है तथा संतान का पालन सृष्टि हेतु पुण्य कार्य है। हिन्दुओं में स्त्री-पुरुष में भेदभाव नहीं है। इसी प्रकार जाति भेद भी धर्म विरुद्ध कुप्रथा है जो मध्यकालीन अंधयुग की देन है जिससे मुक्ति पाना एक दैवीय कार्य होगा। अतः उन वर्गों का उत्थान व मुख्यधारा में विलय एक पुण्य कार्य है जो सभी को मिलकर करना है। मंगल और सुखी जीवन के लिए आवष्यक है कि हिन्दू रोज प्रातःकाल सामुदायिक स्वधर्मी ध्यान, योग, भजन व पूजा करें। समाजषास्त्रियों का मानना है कि आधुनिक समय में समाज व्यक्तिवाद की ओर अग्रसर है जिससे व्यक्तियों में अकेलेपन के चलते उनमें मानसिक तनाव तथा दुःख बढ़ गया है। समुदाय का गठन धर्म के अनुयायियों से बनता है तो वह सर्वाधिक मजबूत होता है। आज आवष्यकता है एक संस्थागत सामुदायिक मिलन व्यवस्था की। हिन्दू सामुदायिक भवन, उद्यान, प्रेक्षागृह आदि आधारभूत ढ़ांचा बनाने हेतु सभी स्वधर्मियों को मुक्त हस्त से सहयोग करना चाहिए। शरीर तथा आत्मा दोनों ही महत्वपूर्ण है इसीलिए कहा गया है ’ शरीर माध्यम खलुधर्म साधनम् ’।

हिन्दू का जीवन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के भव्य दर्षन के तहत संस्कारों व कर्मकाण्डों की माला में पिरोया हुआ है। बिना दर्षन की चादर को समझे हिन्दू की जीवन पद्धति व संस्कारों के महत्व को नहीं समझा जा सकता है। एक बड़ी चुनौती यह है कि बिखरा हिन्दू समाज कैसे एक होकर हिन्दू जीवन पद्धति का निर्वाह करे।

ष्षास्त्र ’ संघे शक्ति कलयुगे ’ तथा ’ अखण्ड एवं संगठनबद्ध ’ होने को महत्वपूर्ण मानते हैं। संस्कार तथा कर्मकाण्ड सामाजिक एकता लाते हैं। इसी प्रकार पर्वों का भी महत्वपूर्ण स्थान है जैसे विजयादषमी को मंदिर जाकर तथा सामूहिक धर्म सभा में सम्मिलित होकर हिन्दू इसे राष्ट्रीय त्यौहार के रुप में मनाते हैं। इसी प्रकार हिन्दुओं के अन्य त्योहारों को सामूहिक रुप से मनाना आवष्यक है। सनातन धर्म से निकले धर्मों के पर्व जैसे बुद्ध पूर्णिमा, महावीर जयन्ती तथा गुरुनानक जयन्ती मनाना भी पुण्य कार्य है। हिन्दू धर्म में तीर्थ व मंदिर जाने का विषेष महत्व है, क्योंकि ये ईष्वर के स्थल हैं। मंदिर में नित्य जाकर कथा सुनना तथा कीर्तन करना, जागरण, सत्संग, व भजन विषेष फलदायक है। मंदिर में स्थित भगवान के विग्रहों में प्राण प्रतिष्ठा की हुई है तथा यहां नित्य पूजा होती है अर्थात ईष्वर का आह्वान हुआ है। जो घरों में स्थापित मन्दिरों में प्रायः नहीं हो पाती है। अतः घरों में मंदिर स्थापित करते समय सुचिता, प्राण प्रतिष्ठा, नित्य पूजा, वास्तु जैसी आवष्यक बातों पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा इसे प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। लेकिन घर में बिना मंदिर स्थापित किए भी पूजा या ईष्वर का स्मरण नित्य होना चाहिए।

जहां धर्म है वहीं विजय है। यही सभी हिन्दुओं का पावन कर्तव्य है कि वे धर्म के उत्थान हेतु कार्य करें। वे स्वधर्मियों की धर्म यात्रा में सहायक बनें। मंदिरों में स्वच्छता हो, लोगों में अनुषासन रहे तथा आपसी स्नेह रहे तो श्रद्धा तथा भाईचारा बढ़ेगा। लोग ’ धर्मों रक्षति रक्षतः ’ अर्थात जो धर्म की रक्षा करे वह सुरक्षित रहेगा में विष्वास करें।

हिन्दुओं के पास समृद्ध दर्षन की विरासत है जिसे अनेक ऋषिकाओं तथा ऋषिओं ने बड़े जतन से सींचा और आगे बढ़ाया। हिन्दू धर्म में खुलापन है और यहां मानवीय बौद्धिक संभावनाओं के विकास व उन्नयन हेतु असीम जगह है। यहां आत्मानुभूति व दिव्य ज्ञान की खोज के रास्ते खुले हैं। हिन्दू मानते हैं कि आत्मा अजर-अमर है और वह नये शरीर में पुनर्जन्म लेती है। हिन्दू धर्म का उत्थान विष्व में मानवतावादी आध्यात्मिक पुनर्जागरण का द्योतक है अतः मानव कल्याण के इस पुण्य कार्य में सभी भागी बनें।

हिन्दू धर्म की प्रमुख धारणायें निम्नलिखित हैं:-

1. ईष्वर एक है और वह अनेकों रुपों में विद्यमान है।
2. वेद, उपनिषद व गीता ईष्वर द्वारा दिए गए हैं।
3. सृष्टि में उसका रचयिता विद्यमान है। ईष्वर सर्वत्र व्याप्त है वह सभी जीवों में है। सृष्टि में रचना व विनाष सत्त प्रक्रिया है।
4. हिन्दू कर्म के सिद्धांत अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को अपने किए का फल मिलता है, में विष्वास करते हैं तथा जीवन का लक्ष्य ईष्वर में अर्थात रचनाकार में विलीन होकर मोक्ष प्राप्ति है।
5. हिन्दू पुनर्जन्म के सिद्धांत में विष्वास करते हैं अर्थात मोक्ष सभी को मिलेगा, लेकिन उसके लिए पुण्य कार्य करने होंगे और जन्म-मरण के दुःख से मोक्ष मिलने तक आत्मा अनेकों जन्म लेती रहेगी और पुण्य कर्मों का संचय होता रहेगा। मृत्यु आत्मा द्वारा वस्त्र बदलने जैसा है। आत्मा अजर-अमर है
6. ईष्वर अदृष्य है तथा मंदिर, भक्ति व सत्कर्म, संस्कार, कर्मकाण्ड ईष्वर के संसर्ग में लाते हैं। सत्गुरु ईष्वरीय मार्ग दिखाने में सहायक होते हैं।
7. जीवन पवित्र है अतः दया, स्नेह, प्रेम, सहिष्णुता व अहिंसा आवष्यक है। धर्ममार्ग पर चलना आवष्यक है।
8. संस्कृत देवभाषा है अतः पवित्र है।

आचार नियम:- शाडिल्य व वरूह उपनिषद एवं पतंजलि के योगषूत्र में नीति वचन दिए गए हैं। बीस ऐसे शूत्र जिन्हें यम (वर्जित) तथा नियम (पालन करने योग्य) कहते हैं जो वितर्कों के नियन्त्रण हेतु हैं। आवेगांे जैसे क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ, लालच, वासना पर नियन्त्रण हेतु दष यमों का प्रावधान है और इसी प्रकार दष नियमों का उद्देष्य श्रेष्ठ गुणों जैसे दया, परोपकार, ज्ञान, आनन्द को बढ़ावा देना है।

हिन्दू संस्कार:- संस्कार धार्मिक अनुष्ठान हैं। हिन्दू जीवन की व्याख्या धर्म चक्र के रुप में की जा सकती है। संस्कार किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़े कर्म हैं जो उसको पूर्णता की ओर ले जाते हैं। उपनिषदों के अनुसार संस्कार धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हेतु आवष्यक साधन हैं। संस्कारों से मानसिक व शारीरिक विकास होता है। संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति का उसकी आत्मा से साक्षात्कार होता है तथा उसका सामुदायिक जीवन व भाईचारा बढ़ता है। संस्कार मनुष्य की पाषविक वृत्तियों को नियंत्रित करते हैं। वेद व्यास द्वारा बताए गए सोलह संस्कारों को महत्वपूर्ण माना गया है जिनमें नामकरण, उपनयन, विवाह, व अन्त्येष्ठि मुख्य हैं।

कर्म:- ये ईष्वर की पूजा से संबद्ध हैं। संस्कार व कर्म के दिन परिचितों, स्वधर्मियों व सज्जनों को घर बुलाकर प्रीत भोज देना चाहिए तथा गरीबों को दान तथा भोजन देना चाहिए।

जीवन की पांच प्रमुख क्रियायें:-

1. उपासना:- उपासना में नित्य घर या मंदिर में पूजा, साधना, भक्ति, गायन, योग, आसन, ध्यान तथा धार्मिक गं्रथों का अध्ययन आता है। ईष्वर का स्मरण करना, जप करना और उसके प्रति समर्पण उपासना का सर्वोत्तम रुप है। ईष्वर के प्रति कृतज्ञता हो और साक्षी भाव हो।
2. उत्सव:- हिन्दू पर्वों में सामूहिक कार्यक्रमों में भाग लेना। मंगल व शुक्रवार को मंदिर जाना, उपवास रखना, पकवान बनाना व ईष्वर को समर्पित करना, दान देना, परिवार व स्वधर्मियों के साथ समय बिताना, खुषियां मनाना आदि इसके अंदर सम्मिलित हैं।
3. धर्म:- महिलाओं, वरिष्ठ सदस्यों, बच्चों, गरीब व दलित एवं आदिवासियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने तथा धर्मपरायण रहने का वचन लेना और इस ओर कार्य करना। अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करना, पर्यावरण हेतु कार्य करना, बीमारों की सुधि लेना, शाकाहार को प्रोत्साहन देना, आदि।
4. तीर्थयात्रा:- तीर्थयात्रा ईष्वर के प्रति गहरे समर्पण का समय होता है। हिन्दुओं को वर्ष में एक बार या कुछ वर्षों के अंतराल में प्रसिद्ध मंदिर व तीर्थ स्थानों में जाना चाहिए।
5. संस्कार:- जीवन यात्रा में संस्कार मील के पत्थर हैं। इन अवसरों पर व्यक्ति अपने समूह के नजदीक आता है तथा ईष्वर का आषीर्वाद प्राप्त करता है।
बौद्ध, जैन, सिख एवं अन्य भारतीय मूल के धर्म सनातन धर्म से निकली धारायें हैं। इन सभी में व्यापक स्तर पर मतैक्य है। इनका मानना है कि दुनियां का इतिहास रैखिक न होकर एक चक्र रुप में है जिसमें कोई प्रारंभ या अन्त न होकर यह परिवर्तन की सतत् प्रक्रिया है। यह जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म का अनन्त चक्र है। स्वर्ग-नरक कोई स्थान न होकर मोक्ष में मुक्ति है तथा पुनर्जन्म की पीड़ा नरक तुल्य है। संसार से मोक्ष पाकर ईष्वर में मिल जाना ही स्वर्ग है। बुरे कर्म वालों को 84 लाख जन्मों के बाद ही मोक्ष मिलेगा, जबकि सद्कर्म से यह एक ही जन्म में संभव है। हिन्दुओं के अनुसार मनुष्य योनि सब योनियों से श्रेष्ठ है। ये सभी धर्म ब्रह्माण्ड की एकता, कर्म व धर्म के सिद्धांत, ओंकार, संसार, निर्वाण, जीवात्मा, पुनर्जन्म, भगवा रंग की पवित्रता, भारत भूमि की पवित्रता, आदि मूल बातों पर विष्वास करते हैं तथापि इनके अनेकों सिद्धांत विषेष व भिन्न हैं। यह रोचक है कि दुनियां भर के बौद्धों के लिए भी भारत पवित्र भूमि है। बौद्ध धर्म के चार पवित्र स्थानों में बोध गया, सारनाथ तथा कुषीनगर भारत में स्थित है तथा लुम्बिनी नेपाल में है। गया बौद्ध धर्मानुयाइयों की काषी है।


मंदिर या किसी पूजा में पुरोहित किसी से जाति न पूछें टेम्पल प्रीस्ट्स are requested not ask for caste of any individual

Temple & Endowments Social Responsibility Act

शंकरचार्यों का काम न्यायालय को करना पड़ा -Women Can Now Enter All Parts Of All Temples In Maharashtra

Prohits to Please Note कृपया सभी पुरोहित ध्यान दें

कन्या भ्रूण हत्या रोकने में पुरोहित Abortion of girl child is sinful

पुरोहित को स्वेत वस्त्र White cloths for hindu Priests

तीर्थ पर्यटन

पुरोहिती का निःशुल्क निर्वाह

सद्गुरु जग्गी ने कहा Satguru Jaggi says

अनादिकाल से सूर्य 'ॐ' का जाप कर रहा है (सुरक्षित गोस्वामी)

महाराष्ट्र में गोहत्या पर लगा बैन, 5 साल की सजा और 10,000 जुर्माना!

मंदिर में नहीं घुसने दिया तो मुस्लिम बना दलित, कहा- ऐसे धर्म का क्‍या फायदा

अमेरिकी सेना में हिन्दू महिला एवं पुरुष पुरोहित कों मिलेगा ऊँ का बैज

'घर वापसी '

पश्चिमी गोलार्ध के "नाथद्वारा" Nathdwara" of the western hemisphere

तीर्थ पुरोहितों की एकजुटता एवं तीर्थ सुधार में प्रयासरत ‘तीर्थ पुरोहित महासंघ’

पुरोहित संघ में रजिस्टर करें . Please help purohits to register in following site.

चर्च ऑफ इंग्लैंड ने साफ किया पहली महिला बिशप का रास्ता - (Church of England formally approves plans for women bishops)

पुरोहितों-पुजारियों 800 रुपये प्रतिमाह पेंशन, Rupees 800 per month to priests in Uttarakhand

वेदों के अनुसार संध्या उपासना प्रति दिन करनी चाहिए।

वैदिक धर्म की जय हो Victory to Vedic religion

महिला पुरोहितों की अपार सफलता Sucess of female priests

 
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